बृहस्पतिवार, 27 अक्तूबर 2011

शमशेर : इतने पास अपने


नया पथ त्रैमासिक का जुलाई-सितंबर २०११ का अंक मुख्यतया शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल और मजाज़ पर केंद्रित है। इसं अंक में मेरा भी एक लेख छपा है, अपने ब्लाग पाठकों के लिए इसे मैं यहा भी दे रहा हूं।


शमशेर : इतने पास अपने


शमशेर से मुलाक़ात उस समय हुर्इ थी जब वे दिल्ली विश्वविधालय की टयूटोरियल लाइब्रेरी बिलिडंग की पहली मंजि़ल पर एक कमरे में उर्दू विभाग की एक योजना के तहत 'उर्दू-हिंदी शब्दकोश' बनाने के काम के सिलसिले में रोज़ बैठते थे और मैं एम. ए. अंग्रेज़ी करने के दौरान और फिर एक सांध्य कालेज में अंग्रेज़ी के लेक्चरर हो जाने के बाद हिंदी एम ए करने के दौर में यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में ही ज़्यादा समय बिताता था। मेरा यह सिलसिला 1967 से 1980 तक जारी रहा। मेरा ज़्यादातर लेखन भी उस दौर में लाइब्रेरी में ही हुआ था। शमशेर के बाद उसी काम में त्रिलोचन शास्त्री भी लगे थे और उनके साथ भी उसी तरह की बैठकबाज़ी होती थी, बल्कि वे तो खु़द लाइब्रेरी में आकर मुझे तलाश कर लेते थे और दिन में कर्इ बार पान या चायपान के लिए बाहर निकाल ले जाते थे। शमशेर संकोची थे, उन से तो उनके कमरे में ही जाकर मिला जा सकता था। फ़रवरी 1976 में मैं भी माडल टाउन में 'के' ब्लाक के एक मकान की छत पर बनी दो कमरे की बरसाती में शिफ्ट हो गया था। उन दिनों माडल टाउन लेखकों की एक बस्ती की तरह लगता था, हर गली में एक दो लेखक रह रहा था, डा. नगेंद्र, रामदरश मिश्र, राजकुमार शर्मा, आनंद प्रकाश, सुधीश पचौरी, मलयज, मुरलीमनोहरप्रसाद सिंह, अजित कुमार और स्नेहमयी चौधरी, कृष्णदत्त पालीवाल, विश्वनाथ त्रिपाठी, रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, बालस्वरूप राही आदि सभी उसी बस्ती में रहते थे, वियोगी हरि भी माडल टाउन से लगे किंग्ज़वे कैंप की हरिजन कालोनी में रहते थे हालांकि मैंने कभी उन्हें देखा नहीं और न ही मैं उन्हें पहचानता था, मुझे यह सच भी नहीं लगता था। शमशेर उस समय मलयज के परिवार के साथ, जी-328 नं0 के मकान के ग्राउंड फ्लोर पर रहते थे जहां अक्सर रविवार को मैं गपशप के लिए चला जाता था, वहां प्राय: मलयज से भी मुलाक़ात हो जाती थी। त्रिलोचन जो बाद में आये थे, वहीं पास ही में एक बरसाती में रहने लगे थे, उनसे तो लाइब्रेरी के प्रांगण में हो ही जाता था, इसलिए घर पर 'सत्संग करने की नौबत नहीं आती थी, मगर शमशेर से मिलना उनके आवास पर ही होता था। त्रिलोचन मेरे घर पर भी आ जाते थे, मगर शमशेर ने सिर्फ़ एक बार 'सरप्राइज़ दिया।
24 जून 1980 को क़रीब दस बजे सुबह वे मेरे आवास पर आये और उनके हाथ में उनका कविता-संग्रह, इतने पास अपने था। वे आ कर बैठे, पानी पिया और संग्रह पर 'डा. चंचल चौहान को बहुत स्नेह के साथ' लिख कर अपने सुंदर हस्ताक्षर और बायीं ओर तारीख़ डाल कर मुझे संग्रह दिया। मेरी खुशी का कोर्इ ठिकाना नहीं था, एक स्वप्न जैसा लग रहा था। उस समय तक मैं अपनी पी.एच.डी. जमा ही कर पाया था, 'डा. तो नहीं ही था, मेरी दो तीन किताबें ज़रूर आ गयी थीं, मुक्तिबोध पर मेरी किताब जो 1976 में छपी थी शमशेर ने और त्रिलोचन ने भी देखी थी, जनवादी समीक्षा भी 1979 में छप चुकी थी। लेखक बिरादरी में मेरी भी गिनती होने लगी थी। बहुत सारे लेख लघुपत्रिकाओं में छप चुके थे, सो दोस्तों ने ठोकपीट कर आलोचक से मिलती जुलती शक्ल वाला 'कुछ' बना ही दिया था। शमशेर जी के लिए शायद आलोचना लिखने वाला कालेज का लेक्चरर 'डा.' ही रहा होगा। इसलिए नाम के साथ 'डा.' लगा दिया। इतने पास अपने संकलन की वह भेंट मैंने संभाल कर रखी हुर्इ है आज भी, कर्इ बार उस संग्रह की कविताएं पढ़ीं, पर उस पर लिखने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाया। मैंने अपनी दुर्बलता शमशेर को कभी नहीं बतायी। वे कविताएं मेरे लिए बहुत बहुत दुरूह थीं, मैंने उस समय के सबसे दुरूह माने जाने वाले कवि मुक्तिबोध की कविताओं के भाव और संवेदनों को अपने तर्इं ग्राह्य कर लिया था, टी एस एलियट और स्टीफ़ेन स्पेंडर तथा बिंबवादी कवि टी र्इ ह्यूम समेत अनेक कवियों को व्याख्यायित करने की गुस्ताख़ी कर सकता था और ऐसी गुस्ताखि़ायां कीं भी, मगर शमशेर की पहले की कविताएं और उक्त संग्रह की कविताएं कर्इ बार पढ़ने के बाद भी मेरे लिए चुनौती ही बनी रहीं। मैं सचमुच चाहता था कि मैं शमशेर पर लंबा लेख लिखूं, क्योंकि वे सचमुच बहुत स्नेह देते थे, वे मुझे इतने पास अपने समझते थे तभी खुद चल कर आये, दो मंजि़ल चढ़ कर और मुझे भावविह्वल कर गये और इस तरह एक चुनौती भी अनजाने दे गये कि लो बेटा, बने फिरते हो कवि और आलोचक, देखो ये कविताएं और बताओ क्या इनके भाव-संवेदन, इसके बिंब तुम्हारे पल्ले पड़ रहे हैं। मुझे उन दिनों अपने आस पास कोर्इ भाष्यकार भी नहीं मिला। शमशेर पर सिर्फ़ मुक्तिबोध का ही एक लेख पढ़ने को मिला था, जो उन्हें समझने में मददगार तो था, मगर उस तरह से कलाविश्लेषण न तो मेरी क्षमता के दायरे में था और न ही उसमें अनधिकार घुसपैठ करने की हिम्मत ही थी। फिर कुछ दिनों बाद एक लेख श्याम कश्यप ने आलोचना पत्रिका में लिखा था जिसमें उन्हें सी पी आइ का कवि सिद्ध करने की कोशिश थी, कविताओं का वस्तुपरक आकलन या उनके भाव-संवेदन की कोर्इ व्याख्या नहीं ही थी। नामीगिरामी आलोचकों में से डा. रामविलास शर्मा ने शमशेर ही क्या, उस दौर के लगभग सभी कवियों को अस्तित्ववादी, रहस्यवादी आदि कह कर ख़ारिज कर दिया था और भाष्य तो किसी की कविता का नहीं किया, अलबत्ता कवियों की निजी जि़ंदगी ख़ासकर 'कामवासना आदि कविताओं में दिखाते रहे। उनकी आलोचना पद्धति वही थी जिसे पशिचम के आलोचक 'बायोक्रिटिसिज़्म' कह कर और रोलां बार्थ जैसे गंभीर चिंतक भी ख़ारिज कर चुके हैं। नामवरसिंह ने भी उस ज़माने में शमशेर जी की कविता के मर्म नहीं खोले थे, उन दिनों वे तो पशिचम की नयी समीक्षा के प्रभाव में आ कर और सूज़न सौंटैग का नाम उछाल कर व्याख्या के विरुद्ध हो गये थे, बाद में शमशेर जी की जीवनसंध्या की विदार्इवेला में सुंदरनगर से लौट कर उनकी कविता पर ज़रूर उन्होंने तन्मयता के साथ एक लेख लिखा जो शमशेर जी की रचनाशीलता समझने में कुछ हद तक पाठकों की मदद करता है। उन्होंने उनकी प्रतिनिधि कविताएं भी संपादित कीं, मगर उसकी भूमिका के तौर पर 'शमशेर की शमशेरियत' ही पेश की, और उस छोटी सी भूमिका में शायद यही उनके लिए संभव था। अशोक वाजपेयी जो कि कला मर्म को समझने वाले रचनाकार हैं, शायद शमशेर की कवितार्इ का सौंदर्य पाठकों तक संप्रेषित कर पाते, मगर उन्होंने भी ऐसा कोर्इ बृहद् प्रोजेक्ट हाथ में नहीं लिया, औरों की ही तरह थोड़ी सी कभी कभार जुमलेबाज़ी भर की, हालांकि शमशेर मुझ से अपनी बातचीत में उन दिनों भी किसी लाभलोभ से प्रेरित हुए बग़ैर अशोक जी की बहुत तारीफ़ किया करते थे। विजयबहादुर सिंह ने जनकवि नामक संकलन में शमशेर की कविताएं शामिल कीं और भूमिका में, संक्षेप में, उन पर रस्म अदायगी के बतौर एक पैराग्राफ़ लिख कर अपने संपादकत्व का धर्म निभा दिया, पैरे के शुरू में ही 'तंत्री नाद कवित्त रस' वाला बिहारी का दोहा उद्धृत करके एक तरह से हथियार डाल दिये, डूबने के डर से। अब जहां ऐसे ऐसे 'एंजेल' चलने में डगमगाते रहे हों तो मैं किस डाल का पंछी हूं कि शमशेर जी के काव्यगगन में उड़ने की हिम्मत करता, बस औरों की ही तरह मैं भी उन कविताओं का मूक आस्वाद करता रहा, 'ज्यों गूंगेहि मीठे फल कौ रस, अंतरगत ही भावै!
शमशेर की कविताएं बार बार पढ़ने पर एक बात ज़रूर महसूस होती है कि पेंटिंग कला का पारखी हुए बग़ैर उनके सिरजे बिंब पकड़ में नहीं आ सकते। इस सच्चार्इ का आभास हमें इस बात से मिलता है कि उनके काव्यसंकलन, इतने पास अपने की 33 कविताओं में से ज़्यादा संख्या उन रचनाओं की है जिन्हें रचने की प्रेरणा किसी न किसी कलाकार की पेंटिंग्स देख कर या किसी की प्रदर्शनी देख कर मिली। अंग्रेज़ी कवि कीट्स ने अपनी एक मशहूर कविता 'ग्रीशन अर्न' पर बनी पेंटिंग से प्रेरित हो कर लिखी थी। उसका मानना था कि भौतिक पदार्थ पर बनी कलाकृति तो काल के गाल में चली जा सकती है लेकिन शब्द में तब्दील करने यानी 'वर्बल आइकन' बन जाने पर वह काल से होड़ ले पायेगी और कीट्स ने यही किया। शमशेर जी भी अपनी कविता में यही काम करते हैं, उन्होंने भी कीट्स की तरह काल को ललकारा, 'काल तुझसे होड़ है मेरी', पर्सपेकिटव यही था, शब्द में चित्र को तब्दील करने से चित्र और साथ ही रचनाकार भी काल को अतिक्रमित कर जाते हैं। वे कलासौंदर्य के रचयिता हैं, वह सौंदर्य 'मकर्इ से वे लाल गेहुंए तलवे' से ले कर 'फ़ान गाग' और 'पिकासोर्इ कला' तक बिखरा पड़ा है जिसे वे 'वर्बल आइकन' में तब्दील करते हैं। उनमें रचाव का यह स्तर और संवेदनात्मक संशिलष्टता शुरू से नहीं थी। इस रचाव का विकास उनमें धीरे धीरे हुआ। आज उनकी सभी कविताएं देख कर उनकी रचनाशीलता के स्तर भेद देखे जा सकते हैं।
उदिता संकलन में उनकी शुरू की कविताएं संकलित हैं, उसमें एक छायावादी रोमानी कवि की रचनाएं हैं, कवि ने खुद उसकी भूमिका में यह स्पष्ट भी किया है, 'मेरी असली ज़मीन तो रोमानी ही थी, रोमानी ही बनी रही...। उस दौर की कविताओं में छायावादी कवियों जैसी ही छंदरचना और भाषा ही नहीं, छायावादी मुक्तिकामना और नवीनता की चाह भी उसी तरह की है जो छायावादियों में उन बिंबों में व्यक्त हुर्इ थी जो मुक्ति के अर्थ संकेत देते थे, जैसे वायु, बादल, नदी, सागर, इंद्रधनुष, चिड़िया, मधुप, फूल, तितली, बच्चा, हिमालय आदि। ये सारे बिंब शमशेर की कविताओं में नये संकेतों के साथ हमें मिलते हैं। उसी दौर में उनकी कविताओं में 'मौन' भी मुखर हुआ था, वह अज्ञेय में तो बाद में एक रूढि़ बन कर व्यक्त हुआ। शमशेर जी की कविताओं में 'मौन' की मुखरता शुरू से ले कर आख़िर तक व्याप्त रही। शुरू के दिनों की एक कविता, 'कवि-कला का फूल हूं मैं', उनके रोमानी दौर की सारी ख़ूबियां समाहित किये हुए है :
प्रेम-नभ का मैं जलद हूं
उर मिलन के उपवनों पर
धीर वर्षा राग हूं मैं
विरह के सूने क्षणों में
स्नेह सागर पार भी
चिर मौन तट की धूल हूं मैं (उदिता, पृ. 18)

उसी दौर की एक अन्य कविता, 'आज हृदय भर भर आता है', में भी 'कितने प्रश्न हो गये उत्तर मौन हृदय में ही उठ उठ कर!' और 'आदि सत्य के मौन कठिनतम' का उल्लेख है। यह 'मौन' उस समय की लगभग सभी कविताओं में मौजूद है जैसे, 'साथ, सम, शांत', 'कितनी करुणा का सागर', 'शरबत-सी आंखों की बानी', 'आज मर्इ की शाम अकेली', 'कौन बुलाता मेरे पथ से मुझको', 'मौन राग ही', 'मृत्यु का प्रस्तर खंड', 'शाम की मटमैली खपरैल', 'ज्योति', 'मेरा झूठा मान', 'वह भी दिन एक था', 'कर्म करो', 'बार बार मन चाहता हे', 'लहरें/शाम/वह नगर', 'ओ मा शक्ति', 'बोलो - आकाश...क्यों मलिन', 'लुटी-मीठी बांसुरी की धुन', 'तुम्हें तो', 'इंदु विहान', 'ऋतुओं के पार आज' जैसी कविताओं में। ये कविताएं उदिता संग्रह में संकलित हैं, जिनमें 'मौन शब्द एक इमेज के तौर पर बार बार आया है। इस संग्रह में ग़ज़लें भी हैं, उसी दौर की और उनमें भी 'मौन का पर्याय 'ख़ामोशी' आया है, 'आरज़ुओं की बियावानी है और ख़ामोशियां' और संग्रह की आख़िरी ग़ज़ल में भी 'ख़ामोशिए दुआ हूं, मुझे कुछ ख़बर नहीं' का काव्यात्मक प्रयोग हुआ है।
'मौन' की इमेजरी शमशेर की कविता में आख़िरी दिनों तक किसी न किसी रूप में मौजूद रही, 'मौन' के अलावा कहीं 'ख़ामोशी' कहीं 'मूक', कहीं 'गूंगी', या 'गूंगा' के रूप में उसकी उपस्थिति देखी जा सकती है। यह इमेजरी दर असल 'बड़बोलेपन' का प्रतिरोध या 'शोर' का प्रतिरोध करती है जैसे बड़े कलाकारों की पेंटिंग्स करती हैं। दूसरे स्तर पर यह इमेजरी युद्धविरोधी चेतना और 'शांति' के संकेत देती है। शमशेर सत्य और प्रेम तथा शांति के लिए समर्पित कवि थे, वे साहित्यकारों की आपसी कलह तक से दुखी हो जाते थे, इसे उन्होंने एक कविता तक में बड़ी तल्ख़ी के साथ अभिधा में ही व्यक्त किया है। वे शांतिप्रिय थे, एक ऐसी दुनिया का सपना उन्होंने अपने भीतर सजा रखा था, जहां प्रेम होगा, भार्इचारा होगा, विश्वशांति होगी, इसी सपने की कलात्मक अभिव्यकित 'अमन का राग' जैसी महान कविता में हुर्इ।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनियाभर में अनेक कवियों, कलाकारों ने यु़द्धविरोधी रचनाएं कीं, शांति और प्रेम का पैग़ाम दे कर मानव सभ्यता को विकसित करने के लिए अपनी रचनाशक्ति का इस्तेमाल किया। शमशेर के 'मौन के आवर्ती बिंब इसी भावसंवेदन का संकेत देते हैं। इसी तरह उनकी प्रेमकविताओं को भी 'लिरिकल' यानी बिल्कुल 'निजगत' नहीं माना जा सकता, हालांकि मुक्तिबोध ने अपने लेख में उन्हें 'निजगत' ही माना था। निजी 'प्रेम' एक भावसंवेदन के रूप में मौजूद ज़रूर रहता है, मगर वे कविताएं शब्दों से तराशी गयी पेंटिग्स या संगमरमरी मूर्तियां हैं, जिन्हें अपनी आस्वादक आंख से पाठक देख और महसूस कर सकते हैं। उनकी कविताओं की यह मूर्तिमयता उसी तरह अदभुत और नयी है जैसी चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी, 'उसने कहा था' की चलचित्रमयता थी। इस कला में शमशेर पश्चिम के बिंबवादी कवियों से भी आगे निकल जाते हैं, क्योंकि पशिचम के इमेजिस्ट अपने बिंबों को प्रतीकों की भाषा देते दिखायी देते हैं, शमशेर ऐसा कोर्इ सायास प्रयास करते नज़र नहीं आते, वे बस एक से एक बेहतरीन 'वर्बल आइकन' बिना छेनी हथौड़ी हाथ में लिये गढ़ते हैं, छीलछाल उनके अभ्यंतर में चलती है।
शब्दों से चित्र या मूर्ति गढ़ते समय भी वे रंगों का इस्तेमाल ज़रूर करते हैं। रंगों के विविध प्रयोग उनके इतने पास अपने संकलन की लगभग सभी कविताओं में देखे जा सकते हैं क्योंकि ज़्यादातर कविताएं एक पेंटर की तरह रंगों को शब्दों से व्यक्त करते हुए रची गयी हैं। उनमें 'बादलों के मौन गेरू-पंख, संन्यासी खुले हैं श्याम पथ पर।' उनमें 'कत्थर्इ गुलाब दबाये हुए हैं नर्म केसरिया सांवलापन।' इस तरह के चित्रों का रचनात्मक आस्वाद इनमें समाहित रंगों के दृश्यबिंबों से ही लिया जा सकता है। शमशेर इन बिंबों में न तो बिंबवादी कवियों की तरह और न ही डब्ल्यू बी येटस या टी एस एलियट या अज्ञेय, यहां तक कि अपने सहचर मित्र मुक्तिबोध की तरह भी किसी तरह का प्रतीकार्थ भरते हैं। 'गोया वो...' कविता जो कि प्रो. एजाज़ हुसैन पर लिखा एक बेहतरीन शोकगीत है की शुरुआत में ही रंगों के साथ रचे चित्र को देखिए :
गोया वो सामने ही हैं
अपनी सांवली सांवली सी पहचान में
काव्योक्तियां मुस्कराते
पान की लालियों से शाम के होठों पर
मन के चित्र बनाते...
और इस कविता का अंत होता है एक वक्तव्य से,
यहां सचमुच
--किसी कैमरे को यक़ीन न आयेगा
वहां सब कुछ सब कुछ निरावरण है
जो, जो कुछ है वही है।
और यह वक्तव्य अभिधा में ही है, शमशेर की रचनाप्रक्रिया को समझने के लिए एक कुंजी है।
दर असल, हम कविता को पैराफ्रेज़ करके और फिर उसके अर्थ ढूंढ़ने के आदी हो चुके हैं, इस वजह से कविता को 'वर्बल आइकन' या शब्दों से चित्रित सीनरी के तौर पर मन की आंख से देखने की हमारी आदत बनी नहीं है। शमशेर हमें ऐसी शाबिदक पेंटिंग्स दिखाते हैं, काश हम उन पेंटिंग्स को देख पाने लायक़ अपने भीतर कलाप्रेमी आंख पैदा कर पाते! 1943 में लिखी तीन पंक्तियों की एक कविता, 'गायें' को अगर पाठक पेंटिंग की तरह देखे तो उसका आनंद ले पायेगा, तुलसीदास के सोरठे की तरह देखेगा तो कुछ भी हाथ नहीं लगेगा:
गायें मैली, सफ़ेद, काली, भूरी।
पत्थर ढुलके पड़े। पेड़ सिथर नीरव।
दो पहाडि़यां धूम-विनिर्मित पावन।
इन तीनों पंक्तियों पर ग़ौर करें, इनमें गायें, पत्थर, पेड़, पहाडि़यां, धूम रंगों से बने चित्र हैं, स्थिर अचल, जैसे चित्रकार के ब्रश से बने होते हैं। 'धूम-विनिर्मित पावन' से मनुष्य की उपस्थिति का संकेत है, जैसा अंग्रेज़ी के महान रोमानी कवि विलियम वर्डस्वर्थ की मशहूर कविता, 'टिंटर्न एब्बी' में है।
शमशेर जी के शब्दचित्रों में सभी जगह स्थिर बिंब नहीं हैं, जहां गतिमयता की ज़रूरत है, वहां भावसंवेदन ख़ुद ही चित्र में गतिमयता लाने के लिए उन्हें बाध्य कर देते हैं। जब 12 जनवरी 1944 को ग्वालियर की सामंती सरकार ने मज़दूरों के संघर्ष का दमन करते हुए गोलियां चलायीं, तो शमशेर जी ने 'य शाम है' शीर्षक से एक 'भावचित्र' खींचा। यह चित्र एक स्थिर सीनरी नहीं हो सकता था। 'धुंआ' की इमेज इस कविता में आवर्ती बिंब की तरह रची गयी है, मगर 'गायें' की तरह स्थिर रंगचित्र के रूप में नहीं, यहां हर पैरे में गतिमयता है, क्योंकि 'धुआं धुआं सुलग रहा गवालियर के मजूर का हृदय।' कविता के पहले पैरे में 'लपक उठीं लहूभरी दरांतियां', दूसरे में 'धुआं धुआं सुलग रहा', तीसरे में 'कराहती धरा', और अंतिम पैरे में '...चल रहा लहूभरे गवालियर के बाज़ार में जुलूस /जल रहा धुआं धुआं / गवालियर के मजूर का हृदय।' पूरा चित्र उस जुलूस को एक गतिशील रील की तरह हमारी आंखों के सामने ला देता है जिसमें वाचक के भावसंवेदन भी हम महसूस करते चलते हैं। यह है शमशेर की कला।
शमशेर की कविता यों तो बहुआयामी है, कहीं चित्रकला की तरह भावचित्र रचे हैं तो कहीं सिने रील की तरह तो कहीं स्वरलहरी या सिंफ़नी की तरह। बहुत बड़ा रेंज है उनकी रचनाशीलता का। यही वजह है कि उनकी रचनाओं को किसी एक काव्यशास्त्र के परिप्रेक्ष्य से नहीं आंका जा सकता। चीनी गणराज्य पर लिखी कविता के लिए वे बायीं तरफ़ चीनी भाषा की चित्रलिपि देते हैं तो कर्इ कविताओं के साथ एब्स्ट्रैक्ट रेखांकन भी उन्होंने दिया है। बहुत सी कविताएं 'कोलाज' की तरह रची हैं और उन्हें उसी रूप में देखने पर हम उनमें रचे बसे भावसंवेदन ग्रहण कर पाते हैं।
यहां यह बताने की ज़रूरत नहीं कि शमशेर की प्रतिबद्धता या हमारे इतने पास अपने पार्टनर की पालिटिक्स क्या थी। वे विश्वसर्वहारा वर्ग के तमाम मूल्यों के साथ थे, फ़ैज़ साहब और अपने सहचर मित्र मुक्तिबोध की तरह दुनियाभर के मज़दूरों, शोषितों, वंचितों के साथ, उनके अंतर्राष्ट्रीय भार्इचारे के साथ, उनकी राजनीति यानी मार्क्सवाद-लेनिनवाद के साथ और शोषणविहीन समाज बनाने के सर्वहारावर्ग के सपनों के साथ थे। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उभरे गांधीवादी मूल्य यानी सत्य, अहिंसा, शांति और प्रेम भी उनकी काव्यचेतना के हिस्से थे क्योंकि उनसे उनकी विचारधारा का ही पोषण होता था। शांति और प्रेम के तो वे अप्रतिम साधक थे। जैसा कि मैंने शुरू में कहा, उनकी कविताओं में 'मौन' जो उनकी काव्ययात्रा के सभी चरणों में मौजूद रहा, दर असल शांति और प्रेम की संवेदना का ही द्योतक है। विश्वशांति के पक्ष में युद्धविरोधी कविताएं हिंदी के आधुनिकतावादी दौर में कर्इ कवियों ने लिखीं, नरेश मेहता, कुंवरनारायण, धर्मवीर भारती आदि इस तरह की कविताओं के जानेमाने रचयिता थे। मगर आधुनिकतावादी कवियों ने युद्धविरोधी भावसंवेदन को जयशंकर प्रसाद की कामायनी के भावसंवेदन की तरह वर्गसंघर्षविरोधी भी बना दिया था। विश्वयुद्ध तो साम्राज्यवादी ताक़तों के द्वारा उपनिवेशों को हड़पने के लालच से लड़े गये थे, तबाह हर जगह अवाम हुए, मनुष्य के श्रम से बनी सुंदर चीज़ें, इमारतें, बाग़बग़ीचे और तमाम मानवमूल्य बरबाद हुए, हिरोशिमा नागासाकी में अणुबम की विनाशलीला ने तो सारी दुनिया को ही दहला दिया था। इसलिए विश्वशांति के आंदोलन के पक्ष में खड़ा होना तभी से हर संवेदनशील रचनाकार का मानवीय कर्तव्य बन गया है, इसलिए आधुनिकतावादी रचनकार भी उस विभीषिका से विचलित हुए थे। यह उनका सकारात्मक पक्ष था। मगर सी आइ ए से संचालित 'कांग्रेस फ़ार कल्चरल फ्रीडम के असर में आ कर अपनी इस चेतना को सिनिसिज़्म तक पहुंचा कर उन्होंने वर्गसंघर्ष के ख़िलाफ़ और प्रगतिवाद के ख़िलाफ़ भी मुहिम चलायी। वर्गसंघर्ष तो समाज की वास्तविकता है जिसमें हर कोर्इ सचेत या अचेत रूप में शामिल है ही, वर्गविभक्त समाज में और दुनिया में जो भी चेतनायुक्त इंसान है, जाने अनजाने किसी न किसी वर्ग या पक्ष में उसकी हिस्सेदारी है ही, उससे बचा नहीं जा सकता। उत्पीड़क और उत्पीडि़त में से किसी के पक्ष में न होना भी एक पक्ष में होना ही है। आधुनिकतावादी जो अपने को 'नदी का द्वीप' समझते थे या खुद को 'एक उछली हुर्इ मछली' मानते थे, 'मर्यादा दोनों ने तोड़ी है पक्ष चाहे सत्य का हो या असत्य का' जैसी शुचितावादी गुहार लगा रहे थे, दर असल मध्यवर्ग की मिथ्या चेतना को ही प्रतिबिंबित करते थे। विश्वयुद्ध के विरोध में वे अपनी आदर्शवादी चेतना का इज़हार कर रहे थे, यह उन कवियों का एक सकारात्मक पहलू ज़रूर था, उनका सिनिसिज़्म उनकी चेतना का नकारात्मक पहलू था जिसका शिकार आज का मध्यवर्ग भी है। शमशेर सचेत रूप से सर्वहारा के पर्सपेकिटव से लैस हो कर विश्वशांति के पक्ष में खड़े थे, वे अपनी 'वाम दिशा' का उदघोष ढेर सारी कविताओं में कर चुके थे। उसी परिप्रेक्ष्य से वे अपना 'अमन का राग' रच रहे थे।
विश्वशांति के पक्ष में लिखी यह कविता अपनी पूरी बनावट में और गहरे भावसंवेदनों की संश्लिष्टता के कारण अप्रतिम है। कवि एक ऐसे समाज का सपना बुनता है जहां विश्वशांति होगी, संस्कृतियों का संगम होगा, पूरी दुनिया की कला, संगीत, साहित्य यानी जो भी इस दुनिया में सुंदर रचा गया है, शांति के विकास और परस्पर भार्इचारे को बढ़ाने के लिए समर्पित होगा, सभी उसका आनंद ले सकेंगे, यानी विश्व के अवाम का सौंदर्यबोध इस क़दर उन्नत होगा कि विश्वमानव सही अर्थों में विश्वग्राम का नागरिक होगा। दुनिया की सभी संस्कृतियों के परस्पर मिलन को शमशेर जी ने एक फ़ैंटेसी में पिरोया है :
ये पूरब पशिचम मेरी आत्मा के तानेबाने हैं
मैंने एशिया की सतरंगी किरनों को अपनी दिशाओं के गिर्द
लपेट लिया
और मैं यूरोप और अमरीका की नर्म आंच की धूप छांव पर
बहुत हौले हौले नाच रहा हूं
संस्कृतियां मेरे सरगम में विभोर हैं...
इन संस्कृतियों में आपस में कोर्इ 'क्लैश नहीं, कोर्इ टकराव नहीं, इसे शमशेर दमदार तरीक़े से 'सच्चाइयां', 'हक़ीक़त' के रूप में बिंबित करते हैं। यह कविता सचमुच एक 'हक़ीक़त' बयान करती है। अगर यक़ीन न हो तो पाकिस्तान और भारत के किसी भी संस्कृतिकर्मी से बात कर के देख लो, अब तो किसी भी देश के रचनाकार, कलाकार से पूछ लो, और दुनिया के किसी भी वर्गचेतस सर्वहारा से या उससे प्रतिबद्ध चिंतक से पूछ लो, नॅाम चाम्स्की से पूछो, फ्रेडरिक जेम्सन से या टेरी र्इगल्टन से पूछ कर देख लो, या दुनिया की सारी कम्युनिस्ट पार्टियों के आपसी भार्इचारे के बारे में, विश्वशांति पर उनके विचारों की पड़ताल करके देख लो। ये सभी उस साम्राज्यवादी चिंतक के कटु आलोचक होंगे जिसने हाल के कुछ वर्षों में 'सभ्यताओं के टकराव' की थीसिस दुनिया के सामने पेश की। शमशेर जी की कविता, 'अमन का राग' आज भी किस तरह संगत है जैसे वह इस थीसिस का जवाब दे रही हो। भारत को विभाजन की त्रासदी इसी तरह के सांस्कृतिक टकराव पैदा कराने वाले साम्राज्यवाद के चाकर सांप्रदायिक तत्वों के कारण झेलनी पड़ी। मानव संस्कृति में विभाजन नहीं, विश्व के सभी हिस्सों की संस्कृति से कविता के वाचक का प्यार है, रवींद्रनाथ ठाकुर की तरह। यह कविता उसी सच्चार्इ का एक स्वप्नचित्र रचती है, इसीलिए 'सच्चाइयां' से शुरू होती है और मध्य में 'हक़ीक़त' को रेखांकित करती है और अंतिम हिस्से में कबीर की आंखिन देखी की तर्ज़ पर 'आंखों के आवर्ती बिंब का प्रयोग करते हुए उस 'हक़ीक़त का बयान करती है जिसे पूंजीवादी नेतृत्व देख पाता तो शांति का वातावरण कभी भंग न होता।
इस कविता में सभी देशकाल के यानी दुनिया भर के भूत, वर्तमान और भविष्य के रचनाकार, संगीतकार, नर्तक और संस्कृतिकर्मी एक दूसरे से मिल रहे हैं, 'सब एक साथ ढार्इ अरब धड़कनों में बज उठे हैं सिंफोनिक आनंद की तरह।' वाचक कहता है कि 'देखो न हक़ीक़त हमारे समय की...' इस कविता में महाकाव्य की परंपरा में ढेरों नामों की माला गूंथी गयी है, होमर, शेक्सपीयर से ले कर अली सरदार जाफ़री तक और सभी देशों के चोटी के कलाकार, रचनाकार और फिर भूत, भविष्यत् के भी, क्योंकि वाचक इस सच्चार्इ को जानता है कि 'आज सब तुम्हारे ही लिए शांति का युग चाहते हैं ...मेरे गुलाब की कलियों-से हंसते खेलते बच्चो तुम्हारे ही लिए, तुम्हारे ही लिए...' वाचक विश्वशांति में सांस्कृतिक एकता का जो सपना देखता है उसे 'सुख का भविष्य' बताते हुए कहता है कि 'यह सुख का भविष्य शांति की आंखों में ही वर्तमान है ' और उसके बाद वाचक इन आंखों की अहमियत रेखांकित करता है :
ये आंखें हमारे इतिहास की वाणी
और हमारी कला का सच्चा सपना हैं...
ये आंखें ही अमर सपनों की हक़ीक़त और
हक़ीक़त का सपना हैं
इनको देख पाना ही अपने आप को देख पाना है समझ पाना है

हम मनाते हैं कि हमारे नेता इनको देख रहे हों

'अमन का राग' इस तरह तमाम साहित्य-कला के संदर्भों, तमाम राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, सामाजिक- सांस्कृतिक-राजनीतिक संदर्भों और विचारधारात्मक-भावात्मक पहलुओं को समाहित करती हुर्इ एक अदभुत संश्लिष्ट रचना है जो अपने 'टैक्श्चर' में भी और अपने 'स्ट्रक्चर' में भी एक साथ बहुत कुछ है, वह रचनाकार के अपने गहन विचारधारात्मक संवेदनात्मक भाव से परिचालित एक कोलाज, एक महाकाव्य, एक चलचित्र, एक नृत्यनाटिका और एक सिंफ़नी है। उदाहरण के लिए, एक बार फिर कविता के प्रारंभ में उन्हीं पंक्तियों के 'टैक्श्चर' पर ग़ौर करें जिनमें वाचक अपने 'स्व' का विस्तार करते हुए कहता है कि 'ये पूरब और पश्चिम मेरी आत्मा के तानेबाने हैं...' यह तानाबाना व्यापक 'कैनवास' का संकेत है, 'सतरंगी किरनों' में रंगों का जि़क्र कलासृजन का द्योतक है ही, 'बहुत हौले-हौले नाच रहा हूं ' में नृत्यकला और 'सब संस्कृतियां मेरे सरगम में विभोर हैं ' के भीतर संगीत बज रहा है। इसी तरह पूरी कविता में संस्कृति के विभिन्न अंग उन हवालों के साथ हैं जिनसे विश्वसंस्कृति के साथ वाचक का लगाव 'अमन का राग' बन कर बजने लगता है, लेकिन उसका आस्वाद तभी संभव है, जब बक़ौल मार्क्स, 'संगीत के आस्वाद के लिए संगीतप्रेमी कान हो।
शमशेर की काव्यकला को इसी तरह देखने और गुनने से उसके भीतर पैठना संभव है शायद।

शुक्रवार, 24 जून 2011

जनकवि नागार्जुन

जनकवि नागार्जुन की जन्मशती के अवसर पर आकाशवाणी के विदेश संचार प्रसारण प्रभाग ने मुझ से अनुरोध कि बाबा नागार्जुन पर दस बारह मिनट की एक वार्ता अंग्रेजी़ में दे दो, सो यह वार्ता रिकार्ड करवा दी, यह विदेश के ही श्रोताओं को 24 जून को सुनायी पड़ेगी, इसलिए इसे मैं अपने पाठकों के लिए अपने ब्लाग पर भी दे रहा हूं, बताइए कैसी लगी यह वार्ता:


Nagarjun, the People’s Poet
Chanchal Chauhan
The birth centenary of Nagarjun who is well known Hindi and Maithili writer is being celebrated all over India this year. Nagarjun whose real name was Vaidya Nath Mishra was born on Jyestha Poornima in June, 1911, in a small village of Bihar, he belonged to Tarauni village in Darbhanga district of Bihar. He was a brilliant student. He learnt Sanskrit, Pali and Praakrit languages, for higher learning he was sent to Varanasi where he came in touch with Hindi writers and thus was attracted to Hindi poetry. He was well-versed in Bangla too.
He began writing poems in Maithili, his mother tongue, at an early age. Later he adopted a pen name, Yatri (Traveller) for his writings in Maithili language. By mid 1930s, he started writing poems in Hindi. He took the job of a teacher in Saharanpur (U.P.) for sime time but he did not continue to be there and wandered from one place to another. He was attracted to Buddhism under the influence of Rahul Sankrityayan, a progressive Hindi writer and went to a monastery in Sri Lanka in 1935, there he became a Buddhist monk so that he might enter the monastery and study the scriptures. At that time he took upon the name ‘Nagarjun’. While at the monastery, he also studied Marxism-Leninism, On his return he got influenced by Swami Sahajanand Saraswati, founder of Kisan Sabha and took part in peasant movement and during the period between 1939 and 1942 went to jail for leading a farmer's agitation in Bihar. He played an active role in Jaya Prakash Narayan's movement prior to the Emergency period (1975–1977), and therefore was jailed for eleven months. He was strongly influenced by Marxist-Leninist philosophy. This was one of the reasons that he never found patronage from the mainstream political establishments.
A wanderer by nature, Nagarjun spent a considerable amount of his time in the 30s and 40s travelling across India. He built a small house in a Delhi village, Sadatpur where he spent some time in the 80’s. I used to visit Nagarjun often in 1973 when he stayed as guest for longer periods with young Hindi writers at Tagore Park, near Model Town in Delhi where I lived. He died in 1998 at the age of 87.
As regards his poetry he wrote first in Maithili, then in Hindi, Sanskrit and Bangla also. In the words of Vishnu Khare, an eminent poet and critic Nagarjun “continued to write both in Maithili and Hindi and while only two Hindi pamphlet-poems, Shapath (Vow) and Chana Jor Garam ('Mighty' Hot Grams) were circulated in 1948 and 1952 respectively, his first, compact yet comprehensive (28 poems) Maithili collection Chitra appeared in 1949 and became perhaps the first modern classic and a standard university textbook in the language. It is a microcosm with poems on the Mithila region and Gandhi and the state-of-the-nation jostling with nature-poems, nostalgia, love and social reform and commitment. Romantic lyricism gradually surrenders to a resolute realism. The longest (169 lines) poem of the collection, Dwandwa (The Duel Within), is uniquely central to the understanding of the poet's painfully chosen way of life and his awareness of the irrevocable, dynamic dialectics of human history…”
If his first collection, in Maithili, was appreciataed for its pictorial quality, Yugdhara, the first one in Hindi, was considered as ‘the Stream of the Age.’ By 1953, the year of its publication, Nagarjun had left behind the nostalgic association with his Meghaduta-Kalidasa Sanskritic lyrical romanticism. He became the forerunner of a new wave of writing in Hindi of progressive content and satirical form. To quote Vishnu Khare again, “he is perhaps the only Hindi poet who saw and wrote about the mighty Indus during one of his wanderings in pre-Partition India. His 10-line, 1950 poem about ‘the five worthy sons of Mother India’ is a piece of classic satire, which he used to recite like a dancing Baul, a folk-form of Bengal. The still shorter, 8-line poem on ‘The Famine and After’ remains a masterpiece of tragedy and resurgence, hunger and satiety, gloom and cheer, establishing him as a major talent in Hindi poetry.”.
The subjects of his poetry are varied. Effects of both his wandering tendencies and activism, is evident in his middle and later works. His famous poem on cloud, Badal ko Ghirate Dekha hai (बादल को घिरते देखा है), is a meaningful poem in the rich tradition of Nirala’s poems on the cloud. He often wrote on contemporary social and political issues. His famous poem Mantra Kavita (मंत्र कविता), is widely considered the most accurate reflection of a whole generation's mindset in India. Another such poem on the visit of Queen Elizabeth, Aao Rani Ham Dhoenge Palaki (आओ रानी, हम ढोंयेंगे पालकी), sarcastically humiliates the Indian ruling elite for showing attitude of servility to British imperialism.
To him, freedom as a democratic value was very dear. He stood for freedom and revolution to free the exploited masses from the system of exploitation of man by man. That is why he is known as Jankavi, the people’s poet. In his creative literature, poetry and fiction he upheld this democratic value till the end of his life. One finds those images and symbols in his poetry that stand for liberty, such as cloud, birds, mountains as were used by all romantic poets in Europe after the French Revolution that unleashed the modern democratic values of liberty, equality and fraternity and influenced creative brains all over the world. Almost all romantic poets such as Blake, Wordsworth, Keats, Shelley used these images in their poetry to express their love for liberty, equality and fraternity. All those poets wrote poems on birds such as cuckoo (Wordsworth), nightingale(Keats), and skylark (Shelley). Nagarjun wrote a meaningful couplet on Cuckoo bird in his poem on ‘Ruler’s Gun’. In the couplet cuckoo is the symbol of freedom of expression conveying a challenge to authority :
जले ठूंठ पर बैठ कर गयी कोकिला कूक
बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक
(Sitting on a burnt tree did cuckoo sing and enjoy/ The rulers’ gun failed to suppress it and destroy).
He used language as gesture to criticise those who became instrumental to suppress the voice of the downtrodden. He reacted sharply to all such happenings in society that touched his sense and sensibility. One can read history of political events in India of his life time in his poetry. His sharp critical sense emerged in creative gesture whenever any event of repression, tyranny on the poor or any undemocratic step by ruling classes was witnessed by his eyes. He used animal imagery such as pig, goat to depict the character of some political leaders of the ruling elite, but he also used meaningful animal imagery to convey the sense of deprivation. For example, in his most famous and widely quoted poem on ‘Famine and After’(अकाल और उसके बाद he uses animal imagery to depict the gravity of the situation during the famine and then also through the same animal imagery he gives expression to the joyful condition of the hungry when they get grain:
कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास 
(For many days cried the hearth and grinder stone remained sad)
कई दिनों तक कानी कुतिया सोयी उनके पास
(For many days the one-eyed bitch slept near them
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
(For many days the lizards on the wall were restless
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त
(For many days the condition of the rats too was miserable)


दाने आये घर के अंदर कई दिनों के बाद
(Then grains reached home after many days)
धुआं उठा आंगन से पर कई दिनों के बाद
(Then smoke arose above courtyard after many days)
चमक उठीं घर भर की आंखें कई दिनों के बाद
( The eyes of the household sparkled after many days)
कौए ने खुजलायीं पांखें कई दिनों के बाद
(The crow rubbed its beak with wings after many days)
This 8-line poem with its symbolic structure only superficially appears to be about famine, but it also grapples with the philosophical debate about idealism and materialism. In a Vedic hymn the Guru tells his disciple that अन्न हि मन: (Grain is mind) and Nagarjun, who was a scholar of Sanskrit dramatised in his poem the message of materialist philosophy and used dialectical method to show how mind and matter coexist in unity and are interdependent. Mind that thinks is made of matter, so grain is mind. The poem also expresses how paradise is regained after the famine is over, when grain reaches the household. He uses the image of rising smoke from the courtyard in the same way as Wordsworth used the image of smoke in the first section of his immortal poem, ‘Tintern Abbey’ in which smoke indicates the presence of human world without which the world of nature is incomplete.
Nagarjun did not confine himself to the genre of poetry to depict the reality of his land. He took to novel writing and wrote novels in Hindi in the rich tradition of Premchand. Nagarjun wrote 13 novels, 11 in Hindi and two in Maithili, and each of them centres on a socio-economic-political theme, making him one of the most 'programmatic' novelists in Indian literature. Ratinath Ki Chachi (Ratinath's Aunt), Balchanma , Varun ke Bete (The Sons of the Water-God Varuna), are some of his novels well appreciated by Hindi readership. His stories are invariably set in rural or semi-urban Bihar and tell the story of the downtrodden and the exploited, amongst them women and children.
Nagarjun was given the Sahitya Akademi Award in 1969 for his historic book पत्रहीन नग्न गुच्छ(Patraheen Nagna Gachh), and the 'Bharat Bharati Award' by the U.P. government for his literary contributions in 1983. He was also honoured by the Sahitya Akademi Fellowship, India's highest literary award for lifetime achievement, in 1994.

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

नया पथ हिंदी त्रैमासिक का फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जन्मशती विशेषांक हमने प्रकाशित किया था उसमें मेरा भी एक लेख शामिल था, उसका संशोधित रूप यहां प्रस्तुत है, यह राजकमल प्रकाशन से शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली पुस्तक में भी रहेगा- चंचल चौहान

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ : निर्वासन के दर्द का अहसास

मशहूर उत्तरउपनिवेशवादी चिंतक एडवर्ड सईद ने कई अन्य पाश्चात्य चिंतकों की तरह निर्वासन के शिकार या विस्थापित लेखकों और अपने मुल्क से दूर कर दिये गये नागरिक समूहों के बारे में विस्तार से लिखा है। अपने इसी सैद्धान्तिक चिंतन के बीच उन्होंने महमूद दरवेश और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का भी ज़िक्र किया है। वे फ़ैज़ से बेरूत में उन दिनों मिले थे जब पाकिस्तान में ज़ियाउल हक़ की फ़ौजी तानाशाही फै़ज़ जैसे जम्हूरियतपसंद अदीबों और दानिशवरों पर किसी भी तरह का कहर बरपा कर सकती थी। फै़ज़ से अपनी मुलाक़ात का ज़िक्र करते हुए एडवर्ड सईद ने अपने एक लेख, `निर्वासन पर कुछ चिंतन´ में लिखा :
कई बरस पहले मैंने अपने ज़माने के उर्दू के अज़ीमतर शायर फै़ज़ अहमद फै़ज़ के साथ कुछ वक़्त बिताया था। वे अपने वतन पाकिस्तान में ज़िया के फ़ौजी शासन के चलते निर्वासित हो कर बेरुत आ गये थे जहां उनका एक तरह से स्वागत हुआ। फि़लिस्तीनी उनके स्वाभाविक तौर से जिगरी दोस्त थे। मैंने महसूस किया कि उन में आपस में बड़ी गहरी आत्मीयता थी जब कि उनकी न तो ज़बान या शेरी रवायत या ज़िंदगी की तारीख़ ही उनसे मिलती जुलती थी। सिर्फ़ एक बार मैंने फै़ज़ को अपने निर्वासन के दर्द से उबरते हुए देखा था जब उनके एक पाकिस्तानी दोस्त, इक़बाल अहमद बेरुत आये थे जो खु़द भी निर्वासित थे। हम तीनों एक गंदे से रेस्त्रांं में देर रात तक जमे रहे, फै़ज़ अपनी नज़्में सुनाते रहे। कुछ देर बाद इक़बाल और उन्होंने हमारे लिए नज़्मों का तर्जुमा करना बंद कर दिया। जैसे रात गुज़रती गयी, इससे कोई दुश्वारी पेश नहीं हुई। जो मैं देख रहा था, उसके लिए किसी तर्जुमे की दरकार नहीं थी। यह नज़ारा एक तरह से प्रतिरोध के स्वर से भरी घरवापसी जैसा था, मानो वे कह रहे हों, `ऐ ज़िया, ले हम आ गये, लाज़िम है, हम भी देखेंगे।´ ज़िया तो असलियत में अपने मुल्क में ही था, वह उनके प्रतिरोध की आवाज़ नहीं सुन रहा था।
एडवर्ड सईद ने फै़ज़ के साथ अपना वक़्त गुज़ारने की इतनी भर दास्तान लिखी लेकिन इतने से ही निर्वासन के उस दर्द का अहसास हमें ज़रूर करा दिया जिसे फै़ज़ साहब ने अपनी ज़िदगी के कई बरसों तक या तो जेलों में रह कर झेला था या फिर दूसरे मुल्कों में रह कर। उनके इस दर्द को उस हक़ीक़त में भी देखा जा सकता था जो फै़ज़ साहब के नज़्म सुनाने के अंदाज़ में छिपी हुई रहती थी और जिससे सुनने वालों को शिकायत रहती थी। मुझे भी उन्हें सुनने का मौक़ा मिला था। नयी दिल्ली के फि़क्की आडीटोरियम में उनका जलसा था जिसमें उन्होंने नज़्में और ग़ज़लें सुनायीं, उसी ग़ैरनाटकीय तरीक़े से जिसका ज़िक्र अक्सर लोग करते थे, उमा शर्मा ने उनकी ग़ज़लों पर एक नृत्यनाटिका तैयार की थी जिससे जलसे में एक नया ही रंग आ गया था, फिर भी वह गायकी सुनने को नहीं मिली जो इक़बाल बानो की `लाज़िम है कि हम भी देखेंगे´ की चुनौतीभरी आवाज़ में उन दिनों सुहैल हाशमी के पास के एक कैसेट में सुनी थी और उसकी प्रतिलिपि अपने पास भी मैंने रखी थी। अब तो इसे इंटरनेट पर आसानी से इक़बाल बानो की वीडियो रिकार्डिंग में सुना जा सकता है।

फै़ज़ की शायरी में `दर्द´ और `तनहाई´ शब्द बार बार आये हैं, लेकिन ये शब्द हमारे अदब के बहुत से आधुनिकतावादियों की तरह ओढ़े हुए `अकेलेपन´ या `दुख सबको मांजता है´(अज्ञेय) के सूत्रबद्ध `दुख´ का आख्यान नहीं हैं, ये तो एक अलग तरह की अनुभूति से उपजे शब्द हैं। सज्जाद ज़हीर ने आधुनिकतावादियों के अकेलेपन को फ़ैशन के तौर पर अपनाया हुआ अकेलापन बताया था। उन्होंने लिखा था:

तनहाई की भावनाओं का वर्णन करना हर कवि अपना पैदाइशी हक़ समझता है और आजकल कतिपय कवियों औार चिंतकों ने तो इसको बाक़ायदा दर्शन का रूप दे दिया है और वे अपने तथाकथित एकाकीपन को इतनी अहमियत देते हैं जितना ज़ोर एक ईश्वर को माननेवाले मुसलमान अल्लाह-त´आला के एकाकी और अद्वितीय होने को देते हैं। लेकिन आप ज़रा फ़ैज़ की इस दर्दनाक लेकिन हसीन तनहाई की कल्पना कीजिए जिसमें दस्ते-सबा की नर्मी और ठण्डक प्रेयसी के हाथों की याद दिलाती है, और चांद की वक्रता को देखकर प्रिया की अनुपस्थिति में, उसके गले में बांहें डाल देने को जी चाहता है।
हिंदी में अज्ञेय ने इसी तरह के `अकेलापन´ का दर्शन ओढ़ा हुआ था। उन्होंने अपनी एक कविता, `सवेरे उठा तो´ में लिखा था :

उस अनदेखे अरूप ने कहा : हां,
क्योंकि ये ही सब चीज़ें तो प्यार हैं
यह अकेलापन, यह अकुलाहट, यह असमंजस, अचकचाहट,
आर्त, अननुभव, यह खोज, यह द्वैत, यह असहाय विरह व्यथा,
यह अन्धकार में जाग कर सहसा पहचानना कि
जो मेरा है वही ममेतर है

यहां जिस `अनदेखे अरूप´ का ज़िक्र है उसे `अल्लाह-त´आला´ ही समझना चाहिए जो हिंदी के आधुनिकतावादियों को वैराग्य का पाठ पढ़ा रहा था और `जो मेरा है´ वही `ममेतर´ लग रहा था, शुद्ध अकेलापन भोगता हुआ काव्यनायक पचास के दशक में हिंदी की आधुनिकतावादी कविता में खू़ब फल फूल रहा था, वह `नदी का द्वीप´ था या `एक बूंद´ या `कनु´। इस सबके विपरीत फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का काव्यनायक माडर्निज्म का लबादा ओढ़े शौक़िया तनहाई का शिकार नहीं था, उसे तो क़ैदे तनहाई में या मुल्क बदर हो कर निर्वासन का दर्द झेलना पड़ रहा था।
यह तो एक आम कहावत है कि `जाके पैर न फटी बिवाई/सो का जाने पीर पराई´। एडवर्ड सईद ने निर्वासन के दर्द का फ़लसफ़ाई जायज़ा लेते हुए इस सत्य को रेखांकित किया है। उन्होंने लिखा है कि `बीसवीं सदी के पैमाने पर, निर्वासन की घटनाओं को न तो सौंदर्यशास्त्रीय तरीक़े से और न ही मानवतावादी नज़रिये से ठीक से समझा जा सकता है, निर्वासन के बारे में रचा गया साहित्य तो सिर्फ़ उस दर्द और नियति को एक वस्तु में बदल भर देता है जिस दर्द से हो कर ज़्यादातर लोग खुद नहीं गुज़रे हैं।´ यह सच्चाई है कि निर्वासन खुद जिसने झेला है, वह जिस गहरी अनुभूति के साथ उसका बयान कर सकता है, वह दूसरा कोई नहीं कर सकता। फ़ैज़ पहले अपने ही वतन में ही 1951-1955 और फिर 1958 में जेल में बंद कर दिये गये, उसके बाद जब जब जम्हूरियत को रौंद कर फ़ौजी हकूमत क़ायम हुई, फ़ैज़ खुद ही बर्तोल्त ब्रेख़्त की तरह मुल्कबदर हो गये, ऐहतियातन उनके लिए यह ज़रूरी था।

एडवर्ड सईद ने अपनी जिस मुलाक़ात का ज़िक्र किया है, उस वक़्त वे बेरुत में आत्मनिर्वासित थे। उनके आत्मनिर्वासन के दर्द को उनकी अनेक रचनाओं में देखा जा सकता है। जेल के अंदर का निर्वासन किस तरह नज़्म की शक्ल अख़्तियार करता रहा, उस पर तो उनके हमदम, उनके दोस्त सज्जाद ज़हीर और मेजर मुहम्मद इस्हाक़ ने अपने लेखों में विस्तार से रोशनी डाली है। दस्ते सबा और ज़िंदांनामा की नज़्में तो हैं ही उसी दौर की, लेकिन तनहाई और निर्वासन का दर्द उनकी बाद की रचनाओं में एक थीम की तरह उभरता है।
कहीं तो कारवाने दर्द की ठहर जाये
किनारे आ लगे उम्र-ए-रवां या दिल ठहर जाये
अमां कैसी कि मौज-ए-ख़ूं अभी सर से नहीं गुज़री
गुज़र जाये तो शायद बाजू़-ए-क़ातिल ठहर जाये
(नुस्ख़ा हाए वफ़ा, पृ. 465)
1971 में लिखी यह ग़ज़ल ज़िदगी भर सहे निर्वासन के दर्द का अहसास कराती है, `बाजू-ए-क़ातिल´ का साया उन पर मंडराता रहा, पाकिस्तान में जम्हूरियत फ़ौजी बूटों के तले रौंदी जाती रही, और कोई न कोई तानाशाही निज़ाम क़ायम होता रहा, और इसीलिए यह समाजी दर्द उनकी आखि़री शायरी तक रचना की शक्ल में हमारे सामने आता रहा।

फै़ज़ की शायरी के वाचक मुक्ति का इंतज़ार करते हैं, यह मुक्तिकामना उनकी अपनी किसी जेल से रिहाई या अपने वतन से दूर रहने के दर्द से निजी मुक्ति से जुड़ी हुई नहीं है, इसीलिए वह निजी या लिरिकल लगती हुई भी एक नाटकीय या वस्तुपरक आख्यान बन जाती है, क्योंकि उसमें तो उस सामाजिक व्यवस्था से मुक्ति का इंतज़ार है जो अभी हासिल नहीं हुई, मुक्ति की उस सुबह का इंतज़ार है जिसमें आदमी द्वारा आदमी का शोषण नहीं होगा, जिसमें कोई सरमायादारों का ज़रखरीद गुलाम तानाशाह अवाम के जम्हूरी हक़ नहीं छीन रहा होगा या सामराजी मुल्क तीसरी दुनिया के मुल्कों पर अपना कब्ज़ा बनाये रखने में कामयाब न हो पायेंगे और सामराजी ताक़तें पूरी दुनिया को किसी आलमी जंग में न झोंक पायेंगी। समाजवाद का सपना देखने वाले तमाम राजनीतिक और विचारधारात्मक संगठनों और रचनाकारों, कलाकारों को उसी मुक्ति की सुबह का इंतज़ार आज भी है। भारत जब आज़ाद हुआ तो उस आज़ादी की सुबह ने कवियों और कलाकारों के जागरूक हिस्सों को उस तरह की खुशी नहीं दी जो आज़ादी उनके सपनों में बसी मुक्ति हासिल होने पर होती। उन्हें इसका गहरा अहसास था कि राजनीतिक सत्ता विदेशी शोषकों के हाथ से देशी शोषक तबक़ों के हाथ आयी है, इसलिए नयी व्यवस्था में भी शोषण की तेग़ ग़रीबों पर चलती रहेगी। हिंदी-उर्दू के कई शायरों ने अपने इस अहसास को वाणी दी, फ़ैज़ ने भी बेख़ौफ़ तरीक़े से अपनी मशहूर नज़्म, `सुबहे आज़ादी´ में इस अहसास को कहा : `ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर / वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं।´
पाकिस्तान के शासकवर्गों ने बार बार वहां के अवाम को सैनिक तानाशाहों के माध्यम से जुल्म और शोषण का शिकार बनाया तो वहां के वामपंथी और जम्हूरियतपसंद शायरों और अदीबों ने बहुत तकलीफ़ें झेलीं, फै़ज़ और हबीब जालिब जैसे शायरों को जेलों में बंद रहना पड़ा, फ़हमीदा रियाज़ को भागकर भारत में शरण लेनी पड़ी। इन हालात पर नज़र डालने पर यह समझ में आता है कि फै़ज़ की कविता में `दर्द´, `दुख´, `ग़म´,`तनहाई´ जैसे बार बार आने वाले शब्दों का क्या सामाजिक सन्दर्भ है। इसी तरह के एक संदर्भ का हवाला एडवर्ड सईद ने थ्योडोर एडोर्नो की निर्वासन के दौरान लिखी उनकी आत्मकथा, क्षत-विक्षत ज़िदगी पर विचार, (Reflections from a Mutilated Life) के बारे में दिये हैं। `निर्वासन में रह रहा बुद्धिजीवी खुद को एक वस्तु में तब्दील होने से इनकार करता है।´ फ़ैज़ के साथ भी यही होता है कि वे खुद को एक कमोडिटी में तब्दील नहीं होने देते, तानाशाहों को उनसे यही तो शिकायत थी, ऐसी ही स्थिति तो हमारे यहां एमर्जैंसी के दौर में थी जब बहुत से बुद्धिजीवियों ने खुद को वस्तु या मिट्टी का माधो बनने से इनकार कर दिया था और निर्वासन की यातना झेली थी।

फ़ैज़ ने अपने निर्वासन का दर्द जिस तरह सहा, वह भी एक मिसाल ही है, क्योंकि उसे उन्होंने दुनियाभर के दुखी, ग़रीब, मज़लूमों के ग़म के साथ घुलामिला दिया, ऐसा ही मशविरा उन्हें रशीद जहां से उन दिनों ही मिला था जब वे अमृतसर में कालेज में लेक्चरर थे जिसका हवाला फ़ैज़ ने अपनी आपबीती में और बी बी सी को दिये अपने एक इंटरव्यू में भी दिया था कि अपने ग़मों के बजाय दुनिया भर के ग़रीबों और वंचितों के ग़मों को महसूस करो और उन दुखों को वाणी दो। फ़ैज़ ने फिर वही किया। अपनी महबूबा से भी कह डाला कि पहले जैसी मुहब्बत की मांग पूरी करना मुमकिन नहीं, यहां फ़ैज़ ने अपने `स्व´ के विस्तार की बात कही है जिसे मुक्तिबोध ने अपनी कई कविताओं में बयान किया था। अपने निज के दर्द से ऊपर उठने की प्रक्रिया आसान नहीं होती, मगर महान कविता के लिए वह ज़रूरी तो होती ही है। यह प्रक्रिया नक़्शे फ़रियादी के दूसरे हिस्से से ही शुरू हो गयी थी, और फिर बाद के संग्रहों में तो दर्द के इस समाजीकरण को बहुत ही कलात्मक तरीक़े से फ़ैज़ ने अपनी शायरी का मौजू बनाया। ग़म की इस बदलती रंगत ने उनकी शायरी में एक नया ही रंग ला दिया। फ़ैज़ ने दुनिया के शोषितों को वे गीत और तराने दिये जो उनकी ज़बान पर नारे बन कर सभी जगह गूंजने लगे। उन्हें अपनी संगठित शक्ति का अहसास कराया, ज़ालिमों के अंत की आशा दी, अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाये रखने का हौसला दिया, उन्होंने ही हमें सिखाया, `बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे´। उन्होंने अपने निर्वासन में अभिव्यक्ति की जो शैली ईजाद की वही सारी जनवादी कविता की शैली बन गयी, `हमने जो तर्ज़े फुगां की है क़फ़स में ईजाद / फ़ैज़ गुलशन में वही तर्जे़ बयां ठहरी है´।

निर्वासन के दर्द को सहने और उसे रचनात्मकता का रूप देने की प्रक्रिया ने फ़ैज़ में क्रांतिकारी आशावाद ज़िंदा रखा। अगर निर्वासन से टूट जाते तो सर्वहारावर्ग के दुश्मनों की ही जीत होती। मेरे दिल मेरे मुसाफि़र में संकलित `शायर लोग´ नज़्म बताती है कि शायर को अपने दर्द को विस्तार देने के लिए क्या करना होता है :
जिन पे आंसू बहाने को कोई न था
अपनी आंख उनके ग़म में बरसती रही
सबसे ओझल हुए हुक्मे हाकिम पे हम
कै़दख़ाने सहे ताज़याने सहे
लोग सुनते रहे साज़े-दिल की सदा
अपने नग़्में सलाख़ों से छनते रहे
(नुस्ख़ा हाए वफ़ा, पृ. 628)
फ़ैज़ की कविताओं में निर्वासन या क़ैद के जो बिम्ब और प्रतीक आये हैं, या जो नग़्में सलाख़ों से छनते रहे, उन्हें हम ख़ासतौर से उनके उन संकलनों में पूरी कलात्मकता के साथ देख सकते हैं जो दस्ते सबा, ज़िंदांनामा, दस्ते तहे संग, सर-ए-वादी-ए-सीना से शुरू हो कर शाम-ए-शहरे यारां, मेरे दिल मेरे मुसाफि़र, ग़ुबारे अय्याम आदि शीर्षकों से पाठकों के सामने आये। रचनात्मकता की एक लंबी यात्रा उन्होंने तय की, पूरी दुनिया के साहित्य और विचारों की जानकारी उन्हें मिली हुई थी। सारी दुनिया में उन दिनों चल रहे मुक्ति आंदोलनों में जूझ रहे अवाम के साथ उन्होंने ख़ुद को जोड़ा, उन से प्रेरणा ली और अपना हौसला बुलंद रखा। निर्वासन के दर्द का अहसास मेरे दिल मेरे मुसाफि़र जो यासर अरफ़ात को समर्पित संकलन था की पहली नज़्म में एक कलात्मक श्रेष्ठता के साथ देखा जा सकता है:
मेरे दिल मेरे मुसाफि़र
हुआ फिर से हुक्म सादिर
कि वतन बदर हों हम तुम
दें गली गली सदाएं
करें रुख़ नगर नगर का
कि सुराग़ कोई पायें
किसी यार-ए-नामाबर का
हर इक अजनबी से पूछें
जो पता था अपने घर का
(नुस्ख़ा हाए वफ़ा, पृ. 613)
इसी संकलन की `तीन आवाज़ें´ कविता में तीन नज़्में आवाज़ की शक्ल में हैं, एक आवाज़, `ज़ालिम´ की है जिसमें व्यंग्य और विडम्बना का अद्भुत प्रयोग है, दूसरी आवाज़ `मज़लूम´ की है जिसमें दुनिया भर के मज़लूमों का दर्द छलकता है, तीसरी आवाज़ आसमान से आने वाली आवाज़, `निदा-ए-ग़ैब´ है जो धार्मिक रूपक की तरह दिखने पर भी एक क्रांतिकारी की आवाज़ बन कर दुनिया भर के शोषितों और वंचितों को हौसला देती है : `उठेगा जब जम्म-ए-सरफ़रोशां/पड़ेंगे दार-ओ-रसन के लाले/कोई न होगा कि जो बचा ले/जज़ा सज़ा सब यहीं पे होगी/यहीं अजाब-ओ-सवाब होगा/यहीं से उट्ठेगा शोर-ए-महशर/यहीं पे रोज़-ए-हिसाब होगा´(नुस्ख़ा-हाए-वफ़ा, पृ.639, समरकंद :1979)।

बेरुत प्रवास के दौरान उन्होंने फि़लिस्तीनी मुक्ति-संग्राम के साथ अपनी एकजुटता क़ायम की और उसे अपनी शायरी का मौजू भी बनाया। बेरुत में 1980 में लिखी `फि़लिस्तीनी शुहदा जो परदेस में काम आये´ और `फि़लिस्तीनी बच्चे के लिए लोरी´ उनकी दो मशहूर नज़्में हैं जिनमें उनके निर्वासन के दर्द का अहसास पूरी भावभीनी करुणा के साथ उभरता है। मुक्तिबोध की एक पंक्ति याद आती है, `भोले भाव की करुणा क्रांतिकारी सिद्ध होती है।` फ़ैज़ उक्त दो नज़्मों में से पहली नज़्म में कहते हैं :
दूर परदेस की बे-महर गुज़रगाहों में
अजनबी शहर की बेनामोनिशां राहों में
जिस ज़मीं पर भी खुला मेरे लहू का परचम
लहलहाता है वहां अर्ज़-ए-फि़लिस्तीं का अलम
(नुस्ख़ा हाए वफ़ा, पृ. 657)
और दूसरी नज़्म जो लोरी की विधा में लिखी गयी है निर्वासन का दर्द झेलते बच्चे को सुलाने के लिए नहीं, उसे मुस्कराते रहने के लिए कहती है, बच्चे के सारे अपने परिवारजन उससे दूर कहीं चले गये हैं, यदि वह रोयेगा तो उसे ज़ालिम और रुलायेंगे और मुस्करायेगा तो उसके अपने लोग भेस बदल कर वापस आयेंगे, यहां शायर ने ईसा मसीह की वापसी या `रिज़रैक्शन´ जैसा रूपक बहुत ही सरल शब्दों में बांधा है:
तू गर रोयेगा तो ये सब
और भी तुझको रुलवायेंगे
तू मुस्कायेगा तो शायद
सारे एक दिन भेस बदल कर
तुझ से खेलने लौट आयेंगे
(नुस्ख़ा हाए वफ़ा, पृ. 660)
मुस्कराते हुए दर्द को झेलना उनकी शायरी की टेकनीक ही नहीं, अवाम के दुश्मनों को चुनौती भी रही, अपने एक गीत में उन्होंने कहा था, `अपने दर्दों का मुकुट पहन कर/बेदर्दों के सामने जायें/जब रोना आवे मुस्कायें/जब दिल टूटे दीप जलायें।´ (नुस्ख़ा हाए वफ़ा, पृ. 676-77)

यह विडम्बना ही कही जायेगी कि जिस शायर ने अपने वतन से बेइंतिहा मुहब्बत की हो, उसे ग़द्दार कह कर लांछित किया जाये, उसके लिए वतन का मतलब सिर्फ़ नक़्शे पर खिंची हुई लकीरें नहीं था, वे सारे अवाम थे जिनसे मिल कर कोई वतन बनता है। अगर उन अवाम के जम्हूरी हकूक़ छीन लिये जायें, ज़ुल्मोसितम के ख़िलाफ़ लब खोलने की आज़ादी छीन ली जाये, और साम्राज्यवाद की शह पर तानाशाही थोप दी जाये तो कोई भी सच्चा संवेदनशील कवि और अदीब बेचैन हुए बग़ैर कैसे रह सकता है। फ़ैज़ ने अपने वतन से मुहब्बत का इज़हार अपनी शायरी में बार बार किया है, 1980 में बेरुत में निर्वासन में रहते हुए भी `ख़याल सू-ए-वतन रवां है/समंदरों की अयाल थामे/हज़ार वहम-ओ-गुमां संभाले/कई तरह के सवाल थामे।´ (नुस्ख़ा हाए वफ़ा, पृ. 664) वे फि़लिस्तीनी शूरवीरों को अपने वतन पर जान न्योछावर करते देख रहे थे और उन से प्रेरणा लेते हुए अपने निर्वासन के दर्द को भूल जाते थे, `शोपेन का नग़मा बजता है´ नज़्म में वे कहते हैं :
कुछ आज़ादी के मतवाले जां कफ़ पे लिये मैदां में गये
हर सू दुश्मन का नर्ग़ा था, कुछ बच निकले, कुछ खेत रहे
आलम में उनका शोहरा है
शोपेन का नग़मा बजता है
(नुस्ख़ा-हाए-वफ़ा, पृ. 630)
कुछ आलोचकों ने फ़ैज़ की शायरी को रूपवादी संरचनावादी नज़रिये से देखने की कोशिश करते हुए उनके अर्थों और उनके अंतर्निहित रुझान को विकृत भी किया है। ऐसी ही एक कोशिश जनाब गोपीचंद नारंग की भी मुझे दिखायी पड़ी जिन्होंने फ़ैज़ की एक मशहूर नज़्म, `दस्ते तहे संग आम्दा´ (जिस पर फ़ैज़ ने अपने एक संकलन का नाम भी रखा) की संरचनावादी व्याख्या करके यह बताया कि यह कै़दख़ाना विचारधारा का भी हो सकता है जिससे मुक्ति की कोशिश शायर कर रहा था, ऐसा अर्थ निकालते हुए उन्होंने प्रगतिशील आंदोलन पर भी लगे हाथ चोट कर दी, और फ़ैज़ को अली सरदार जाफ़री के मुक़ाबले विचारधारा की जकड़बंदी से मुक्त तथा इंडोपर्शियन सौंदर्यशास्त्र का पालन करने वाला शायर बताया और यह भी कहा कि मार्क्सवादी इस सौंदर्यशास्त्र को `बूर्जुआ´ कहते हैं। वे मानते हैं कि फ़ैज़ की कविता में `मौन´ और `अंतराल´ ही उन्हें विचारधारा को अतिक्रमित करने में मदद पहुंचाते हैं। गोपीचंद नारंग को यह नहीं मालूम कि विचारधारा को परोक्ष रखने की सलाह रचनाकारों को सबसे पहले एंगेल्स ने ही दी थी जो मार्क्सवाद के प्रणेता थे। अपनी काव्य परंपरा ही नहीं, पूरे अतीत की संस्कृति का वाहक सर्वहारावर्ग को ही होना है और यह संदेश लेनिन ने और माओ ने भी प्रगतिशील रचनाकारों और संस्कृतिकर्मियों को अपने अपने समय में दिया था जो आज भी प्रासंगिक है। इसलिए अगर फ़ैज़ अपनी कविताओं के लिए इंडोपर्शियन सौंदर्यशास्त्र से काम ले रहे थे या समूचे विश्व के बेहतरीन अदब और कला की रवायत को आगे बढ़ा रहे थे, तो यह उनकी विचारधारा का कोई विचलन नहीं था और न किसी मार्क्सवादी ने इस सौंदर्यशास्त्र को `बूर्जुआ´ या `सामंती´ कहा। यह तो नारंग साहब की अपनी ही ख़ामख़याली है, बक़ौल फ़ैज़, `वो बात, सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था / वो बात उन को बहुत नागवार गुज़री है।´ फ़ैज़ के ज़िंदानामा में कविताओं से पहले सज्जाद ज़हीर की एक छोटी टिप्पणी उस संकलन में शामिल है, जिसमें इस शायर और अपने हमदम, अपने दोस्त और क़ैद के संगी साथी की कविताओं में पंरपरा से लिये गये सौंदर्यबोध की तारीफ़ की है, उन्होंने तो इस बोध को `बूर्जुआ´ या `सामंती´ नहीं कहा जबकि वे तो प्रगतिशील लेखक संघ की बुनियाद रखने वाले अदीब थे। उन्होंने लिखा:
जहां तक उन इक़दार (मूल्यों) का तआलुक़ है जिनको शायर ने उन में पेश किया है वो तो वही हैं जो उस ज़माने में तमाम तरक़्क़ीपसंद इंसानियत की इक़दार हैं, लेकिन फ़ैज़ ने उन को इतनी ख़ूबी से अपनाया है कि वो न तो हमारी तहज़ीबो तमद्दन की बेहतरीन रवायत से अलग नज़र आती हैं और न शायर की इनफ़रादियत, उसका नर्म, शीरीं और मतरन्नुम अंदाज़-ए-कलाम कहीं भी उनसे जुदा हुआ है।
(नुस्ख़ा हाए वफ़ा, पृ. 198)
नारंग जैसे बहुत से आलोचक पश्चिम से उधार ली गयी या चोरी की हुई आलोचना पद्धतियों का इस्तेमाल अक्सर प्रगतिशील जनवादी विचार परंपरा पर हमला बोलने के लिए करते हैं और ज़्यादा मग़ज़पच्ची संरचनावाद पर करते हुए वे पाठकों को यह सीख देते हैं कि `फ़ैज़ को किस तरह नहीं पढ़ना चाहिए´ (उनके लेख का यही शीर्षक है) और कैसे पढ़ना चाहिए इसके लिए उन्होंने उनकी एक नज़्म `दस्ते तहे संग आम्दा´(चट्टान के नीचे दबा हाथ) की संरचनावादी व्याख्या की है। यह बिम्ब कवि ने ग़ालिब से लिया है। ग़ालिब के वक़्त उपनिवेशवादी ईस्ट इंडिया कंपनी की चट्टान के नीचे कलाकार का हाथ दबा था, 1857 के उस वक़्त के वहशी दमन और उत्पीड़न को ग़ालिब ने अपनी आंखों देखा था, फ़ैज़ ने मार्शल लॉ की चट्टान के नीचे दबे हुए तख़्लीक़ी हाथ को देखा था, उन्होंने रचनाकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लगी पाबंदी ही नहीं, दुनिया के कई देशों पर सामराजी दमन के वहशीपन को भी देखा और तमाम वंचितों, वतन बदर किये अवाम और निर्वासन में जी रहे इंसानों का दर्द भी तल्ख़ी से महसूस किया था। लुडमिला वासीलेवा की फ़ैज़ पर लिखी किताब का रिव्यू करते हुए अदीब ख़ालिद ने इस बात को रेखांकित किया है। उन्होंने लिखा है कि फ़ैज़ साहब ने 1982 के एक वक्तव्य में ख़ुद यह कहा था:
एक मुसिन्नफ़ की हैसियत से हालांकि मैं किसी मुल्क का कामकाज नहीं संभालता हूं और न ही मेंरे पास कोई प्रशासनिक ताक़त है, मुझे यह अहसास करने का हक़ ज़रूरहै कि मैं अपने भाई बंधुओं का अभिभावक हूं और मेरे भाई बंधु पूरी दुनिया के अवाम हैं। मेरे तईं अमन, आज़ादी, युद्धबंदी, और एटमी होड़ की मुख़ालिफ़त ही प्रासंगिक हैं। इस विशाल भाईचारे में से मेरे और मेरे दिल के सबसे नज़दीक वे अवाम हैं जो अपमानित, निष्कासित और वंचित हैं, जो ग़रीब, भूखे और परेशान हैं। इसी वजह से मेरा लगाव फि़लिस्तीन, दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया, चिले के अवाम और अपने मुल्क के अवाम और मुझ जैसे लोगों से है।
जिस तरह वे खुद निर्वासन का दर्द झेल रहे थे उसी तरह वतन बदर हुए अनेक फि़लिस्तीनी अवाम और दुनिया के कई मुल्कों में दमन और उत्पीड़न के शिकार भोले भाले लोग उनके स्वाभाविक तौर पर हमराही थे, उनका दर्द भी वे अपनी शायरी में व्यक्त कर रहे थे, कहीं वह दर्द सीधे सीधे कहा गया है तो कहीं वह प्रतीकों और बिम्बों के माध्यम से आया है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि वे पस्तहिम्मती नहीं दिखाते, एक उम्मीद हर जगह जताते हैं, ज़ुल्मोसितम के अंधेरे छंटेगे और बेहतर भविष्य की सुबह आयेगी। दस्ते तहे संग की नज़्में वतन बदर होने से पहले की हैं मगर उनमें भी उनकी कै़द की जिंदगी में मिले दर्द की कलात्मक अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। भाषायी पैराडाक्स का बेहतरीन इस्तेमाल भी जनाब नारंग को नज़र नहीं आया, विचारधारा का बंधन दिखायी दे गया। नज़्म की पहली दो पंक्तियां उस दर्द का इज़हार करती हैं मगर, उनके बाद दो पंक्तियां उस मायूसी को पैराडाक्स की शक्ल दे देती हैं :
बेज़ार फ़ज़ा, दरपये आज़ार सबा है
यूं है कि हर इक हमदम-ए-देरीना ख़फ़ा है
हां बादाकशो, आया है अब रंग पे मौसम
अब सैर के क़ाबिल रविशे आबोहवा है
(नुस्ख़ा हाए वफ़ा, पृ. 316 )
गोपीचंद नारंग इस पूरी नज़्म का एक संरचनावादी पाठ पेश करने का दम भरते हैं और यह घोषणा करते हैं कि यह कविता `न तो प्रेम कविता है और न राजनीतिक कविता´। मगर जब इस नज़्म के मेटाफ़र व्याख्यायित करने लगते हैं तो उनके सामाजिक-राजनीतिक पक्ष ही उजागर करने पर मजबूर होते हैं। इस पूरी कविता में `इल्ज़ाम की बरसात´, `ज़हर हलाहल´, `ज़ुल्म´, `जेल´, `ज़ंजीर´, `सज़ा´, `हथकड़ियां´ और अंत में ग़ालिब से लिये हुए बिम्ब, `गिरफ़्तारी´,`चट्टान के नीचे दबा हाथ´ क्या उस राजनीतिक चेतना के बग़ैर व्याख्यायित किये जा सकते हैं जिसकी वजह से शायर आख़िरी दिनों तक अपने निर्वासन में भी `अर्ज़े-ए-वतन´ से कहता रहा कि

हम तो मजबूर-ए-वफ़ा हैं, मगर ऐ जान-ए-जहां
अपने उश्शाक़ से ऐसे भी कोई करता है
तेरी महफि़ल को ख़ुदा रक्खे अबद तक क़ायम
हम तो मेहमां हैं घड़ी भर के हमारा क्या है
(नुस्ख़ा हाए वफ़ा, पृ. 645)
एक ऐसे शायर की शायरी की संरचनावादी व्याख्या करके उसके अर्थ को विकृत करना उसकी विचारधारा के विरोधियों का एक शगल रहा है जो अपने वतन और दुनिया की उस जनशक्ति को अपनी महबूबा की तरह देखता है जिसकी मुक्ति के लिए वह तड़पता है, और जीवन के अंत तक अपनी विचारधारा से विचलित नहीं होता। संरचनावाद का जप करने से या अल्थ्यूसर और रोलां बार्थ का नाम स्मरण कर लेने से संरचनावादी व्याख्या भी नहीं होती और की जायेगी तो निहायत विकृत और फूहड़ क़िस्म की ही होगी।

कुछ लोगों ने फ़ैज़ के बारे में यह भी कहा कि वे अपनी मार्क्सवादी विचारधारा के प्रति शंकालु हो रहे थे और उनका कमिटमेंट कमज़ोर पड़ रहा था, सोवियत व्यवस्था से उनका मोहभंग हो रहा था। उनका देहांत 1984 में हुआ था, सोवियत संघ का विघटन बाद में हुआ था। ये आरोप मनगढ़ंत ही हैं, इस तरह के आरोप हिंदी में मुक्तिबोध पर भी लगाये गये थे, रचनाओं में इस तरह की दूर की कौड़ी लाना और शायर को लांछित करना प्रतिक्रियावाद की शरारत ही कही जायेगी। ऐसे लोगों से ही वे अपने अंतिम दिनों की एक सुंदर प्रेरणादायक नज़्म, `इधर न देखो´ में कहते हैं :

उधर भी देखो
जो हर्फ़-ए-हक़ की सलीब पर अपना तन सजा कर
जहां से रुख़्सत हुए
और अहले जहां में इस वक़्त तक नबी हैं
(नुस्ख़ा हाए वफ़ा, पृ. 717)
फ़ैज़ साहब की शायरी की यही तो ख़ूबी है कि वे इश्क़, वतन से मुहब्बत, अपनी इन्क़लाबी विचारधारा, और दुनिया के मेहनतकशों और वंचितों व मज़लूमों के साथ हमदर्दी और अपने निर्वासन के दर्द को इस तरह अपनी शायरी में घुलामिला देते हैं कि उसमें यथार्थ की बहुत सारी परतें कलात्मकता की नयी झलक देती हैं। उनकी एक ग़ज़ल के इस शेर को देखें:

ऐसे नादां भी न थे जां से गुज़रने वाले
नासेहो, पंदगरो राहगुज़र तो देखो
(नुस्ख़ा हाए वफ़ा, पृ. 280 , मंटगोमरी जेल, 4 मार्च 1956)
उनकी विचारधारा के विरोधी भी उनकी कलात्मक संश्लिष्टता पर मोहित हैं और उन्हें अपनी घटिया आलोचना का शिकार नहीं बना पाते। हम लोगों का प्यारा यह शायर उर्दू में ही नहीं, पूरी दुनिया के अदब में हमेशा हमेशा एक चमकता सितारा रहेगा।

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

मार्कंडेय की कहानी कला

मार्कंडेय जी एक साहित्यिक पत्रिका निकालते थे जिसका नाम था: कथा । उनके निधन के बाद भी उनके परिवार जन इस पत्रिका का एक अंक निकालने जा रहे हैं, उनकी एक बेटी, स्वस्ति का आग्रह था कि एक लेख मैं भी मार्कंडेय जी पर लिखूं, तो यह लेख लिख डाला। कथा में तो यह प्रकाशित होगा ही, अपने ब्लाग के पाठकों के लिए इसे यहां दे रहा हूं- चंचल चौहान



मार्कंडेय जी के निधन की खबर रात में जिस समय मुझे मिली उस समय मैं रेलगाड़ी में था, झारखंड राज्य इकाई के जमशेदपुर में होने वाले सम्मेलन में भाग लेने जा रहा था। जनवादी लेखक संघ के स्थापना वर्ष यानी सन् 1982 से अब तक का हमारा साथ रहा, उसमें आने वाले इस चिर व्यवधान से सदमा तो पहुंचना ही था। हमारी देर तक मुलाक़ातें मुख्य रूप से दिल्ली में ही हुईं, बदकि़स्मती से उनकी दो बीमारियों के इलाज के दौरान ही। साहित्य या संगठन पर जो भी चर्चाएं हुईं, वे संगठन की बैठकों या सेमिनारों में ही। उनके लिखे को पढ़ता रहा, मगर कभी उनके रचनात्मक अवदान पर लिखने का मौक़ा नहीं मिल पाया। जलेस के बनारस सम्मेलन (1984) से ले कर अब तक संगठनात्मक जिम्मेदारियों के निर्वाह में मेरा लेखन कुछ शिथिल तो हुआ ही है, सो यह अफ़सोस रहा कि मार्कंडेय जी के जीवनकाल में उनके कथासाहित्य पर कुछ नहीं लिख पाया, सिर्फ मौखिक चर्चाएं जरूर होती रहीं, ग़लत व्याख्याओं से जनित उत्तेजक बहसों में ही। इधर उनकी सारी कहानियां एक साथ पढ़ने का समय निकाला, तो उनके भीतर एक सूत्र तलाश किया, जिसे मुक्तिबोध संवेदनात्मक उद्देश्य कहा करते थे। अब मार्कंडेय जी का रचना व्यक्तित्व हमारे सामने रहेगा, शरीर तो हम सभी का नाशवान है, इसलिए हर कहानी अपने में अब एक टैक्स्ट, एक पाठ है जिसकी व्याख्या के लिए पाठक स्वतंत्र है, अपनी इसी स्वतंत्रता का निर्वाह करते हुए उन्हें अपनी निजी श्रृद्धांजलि के रूप में यह लेख प्रस्तुत है। हमारे पाठक भी इस पाठ या कुपाठ से सहमत या असहमत हो सकते हैं, यह जनवादी स्वतंत्रता उन्हें भी है ही।


आज़ादी के बाद के दौर में हिंदी कहानी में जिन रचनाकारों ने नये सामाजिक यथार्थ को अपनी वैचारिक पक्षधरता के साथ चित्रित किया उनमें मार्कंडेय का नाम भी अग्रणी पंक्ति में माना जाता है । जहां राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, मोहन राकेश, मन्नू भंडारी, भीष्म साहनी आदि ने शहर के निम्नमध्यवर्ग की मनोचेतना की तस्वीरें पेश कीं, मार्कंडेय ने अपनी कहानियों मे ज्यादातर भारत के देहाती जीवन की चित्ररचना की । अंग्रेज़ी के रोमानी कवि विलियम ब्लेक ने अपने गीतों की पुस्तक का नाम रखा था, सांग्स आफ़ इन्नोसेंस एंड सांग्स आफ़ एक्सपीरियेंस, उसका उपशीर्षक दिया, ‘मन की दो परस्परविरोधी दशाए’। नयी कहानी के दौर की भी ये दो परस्परविरोधी मनोदशाएं थीं, शहरी जीवन के यथार्थ में आधुनिकतावादी कथानायक चालाक, काइयां और अवसरवादी होता था, चाहे वह ‘चीफ़ की दावत’ में चित्रित हो, या ‘टूटना’ में या ‘जिंदगी और जोंक’ में चित्रित मध्यवर्ग । ये सब ‘सांग्स आफ़ एक्सपीरियेंस’ के कथानायक थे और शहरी कहानी का नारा भी यही था, अनुभूति की प्रामाणिकता और भोगा हुआ यथार्थ । उस दौर के तीन कहानीकार (फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, शेखर जोशी और मार्कंडेय) ‘सांग्स आफ़ इन्नोसेंस’ के रचनाकार हैं, इनकी कहानियों के कथानायकों की मासूमियत या तो छली जाती है, या अपनी अस्मिता खो बैठती है, इनमें ‘मारे गये गुलफाम’ की केंद्रीय थीम ध्वनित होती रहती है, भारतीय समाज में ऐसे पात्र जो मासूमियत की नुमाइंदगी करते हैं, आज़ादी के बाद के समाज में किस तरह जी पाते हैं या मर जाते हैं, उनके शरीर और मनोचेतना के विश्वसनीय खाके़ इन कहानीकारों ने ही रचे। मार्कंडेय की कहानियों की केंद्रीय थीम मासूमियत ही है, यहां तक कि शहरी जीवन पर लिखी कहानियो में भी, मसलन ‘प्रिया सैनी’ जैसी कहानी तक में, जिसे बिना ठीक से समझे, डा. चंद्रभूषण तिवारी मज़ाक का विषय बनाया करते थे, मार्कंडेय जी को चिढ़ाने के लिए।
मार्कंडेय जी के सात कहानी–संग्रह प्रकाशित हुए जो बाद में एक जिल्द में ‘मार्कंडेय की कहानियां’ शीर्षक से लोकभारती ने छापे। ‘पान फूल’ उनका पहला कहानी संग्रह था, मार्कंडेय जी के मुताबिक़ वह पहले पहल 1954 में और फिर 1957 में छपा था, उसकी पहली ही कहानी एक मशहूर कहानी बन गयी थी––‘गुलरा के बाबा’ । जैसा कि मैंने कहा कि उनकी कहानियां ‘सांग्स आफ़ इन्नोसेंस’ हैं, जिन गीतों के केंद्र में मासूमियत का प्रतीक ‘बच्चा’ या उसका बिंब रहा था, गुलरा के बाबा के अंदर भी आप उस बच्चे को देख सकते हैं। कहानी के ठीक बीचोंबीच उस बच्चे का बिंब आता है : ‘उस समय बाबा बच्चे थे।’ (मार्कंडेय की कहानियां, लोकभारती, पृ. 5) एक मासूम बच्चे के रूप में एक वेश्या की जिस मासूम लड़की के साथ खेल रहे थे, वह जवान हो कर बाबा के पास प्रणय निवेदन के साथ आती है, तो बाबा बाबा ही बने रहते हैं, निर्विकार, उनकी जगह शहरी मध्यवर्ग का कोई आधुनिक पात्र, भले ही वह हिंदी का प्रोफे़सर ही होता, उस लड़की को खुशी खुशी उपकृत कर देता। बाबा के साथ जो दो नवयुवक रहते हैं, उन्हें भी ‘बच्चे’ के बिंब से चित्रित किया गया है जिनके साथ मिल कर उन्होंने उस सिल्ली को चीरने के लिए खड़ा कर दिया जिसे ‘दस आराकस और आठ चरवाहे और लोहार––कुल अठारह’ लोग भी टस से मस न कर सके। जब लोगों ने बाबा की ताक़त की तारीफ़ की तो बाबा ने कहा कि यह ज़ोर तो उन्हीं दो लड़कों का था । यह सुन कर ‘बच्चे हंस पड़े । लोहार ने कहा, ‘नहीं बाबा, ये सब बच्चे हैं, क्या ज़ोर लगायेंगे।’ कहानी का अंत जिस घटना से होता है, वह भी मासूमियत का ही उदाहरण है, बाबा अपना परोसा खाना छोड़ कर चैतू की टूटी टांग सेट करने चले जाते हैं, और उसकी टूटी छान देख कर इतने द्रवित हो जाते हैं कि दूसरे ही दिन गुलरा की सरपत कटवाने के लिए पच्चीस मज़दूर लगा देते हैं, किस लिए, ‘चैतुआ की छान्ह टूट गयी है’।(मार्कंडेय की कहानियां, लोकभारती, पृ. 8) यह बालसुलभ मासूमियत तो आज के गांवों में भी अब नहीं मिलती
उक्त संकलन की ही शीर्षक कहानी, ‘पान फूल’ को भी आप ‘सांग आफ़ इन्नोसेंस’ की तरह पढ़ सकते हैं। यह कहानी तो है ही बच्चों की मासूमियत के बारे में। जानकी की बच्ची नीली, और उसके यहां काम करने वाली पारो की बच्ची रीती, की यह त्रासद कहानी है। इनकी मासूमियत को पूरी कहानी में तरह तरह के ‘फूलों’ के बिंबों से सजाया गया है, उनकी मासूमियत को ‘सेलीब्रेट’ करने के लिए जब गांव के लोग बाउली पर पहुंचते हैं, तो वे दोनों बच्चियां बाउली में डूब चुकी होती हैं, पानी की सतह पर तैरते पान फूल ही लोगों को दिखायी देते हैं, नीली और रीती नहीं। दर असल, आज़ादी के बाद के माहौल में चालाकी, छल, फरेब, बेईमानी और कलह आदि से भरे भवसागर में मासूमियत डूब रही थी, कुछ कहानीकारों ने जिनका जि़क्र मैंने ऊपर किया है, इस मासूमियत को ही रेखांकित करने की रचनात्मक कोशिश की थी, वे इसी लोप होती मासूमियत की ट्रेजिडी रच रहे थे। मार्कंडेय की कहानियों की तो केंद्रीय थीम ही यह है। हिंदी के कथा आलोचकों ने इस केंद्रीय थीम को पहचाना ही नहीं, इन कहानियों में कोरी भावुकता ही देखी।
मार्कंडेय जी की सारी कहानियों का विवेचन इस छोटे से आलेख मे संभव नहीं, उसके लिए तो एक पूरे शोध ग्रंथ की दरकार होगी, और कोई न कोई शोधार्थी किसी न किसी विश्वविद्यालय में यह काम करेगा ही या शायद कर रहा होगा। मैं कुछ एक कहानियों और ख़ासकर उनके संकलनों की शीर्षक कहानियों की पड़ताल करते हुए उनमे ‘सेलीब्रेट’ की गयी मासूमियत को ही रेखांकित करना चाहूंगा। उनके दूसरे संकलन, ‘महुए का पेड़’, की शीर्षक कहानी को इस नज़र से देखा जाये। यह कहानी दुखना नामक एक ग़रीब विधवा के महुए के पेड़ की कहानी है, जिसके ‘फूल क्या होते हैं जैसे मिश्री के दाने। गांव के लोग उसे मिसिरहवा कहते हैं।’ दुखना का इस पेड़ से ‘बड़ा निकट संबंध है।’ ‘दुखना कभी उसे अपना बच्चा समझती थी।’ अंग्रेजी कवि वर्डस्वर्थ ने जब अपने काव्यशास्त्र की रचना की तो उसमे भी मासूमियत के प्रतीक दुखना जैसे पात्रों को चुनने की सलाह दी क्योंकि ‘उनका प्रकृति के साथ निकट का संबंध होता है’। इस कहानी में भी बच्चों के बिंब बार बार आते हैं। दुखना जब तीर्थ यात्रा के लिए कुछ पैसे उधार लेने के लिए अपने किसी रिश्तेदार के यहां जाती है तो यह अफवाह उड़ जाती है कि दुखना तो कहीं चली गयी और गांव के ज़मीदार को मौक़ा मिल गया, उसने उसका महुए का पेंड़ कटवा दिया जो उसकी झोंपड़ी पर ही गिर पड़ा और जब दुखना लौट कर आयी तो उसने वह विध्वंस देखा । उसकी बेबसी, उसकी करुण दशा का चित्र कहानीकार ने सहज ही खींच दिया है, मासूमियत की प्रतीक दुखना के अवसान की कहानी है ‘महुए का पेड़’।
मार्कंडेय जी का तीसरा संकलन, था, ‘हंसा जाई अकेला’ । इस संकलन की शीर्षक कहानी की व्याख्या आधुनिकतावादियों की नज़र से भी की जा सकती है, क्योंकि इसमें हंसा नामक कथानायक का अकेलापन रेणु के हीरामन के अकेलेपन की तरह ही चित्रित किया गया है। लेकिन मैं इसे भी अकेलेपन के बजाय हंसा की मासूमियत की कहानी के रूप में देखता हूं। रतौंधी का शिकार हंसा रात के वक्त कहीं से गांव के ही लोगों के साथ लौट रहा था, रास्ते में एक नौजवान बहू से अंधेरे मे टकरा गया तो उसे गिरने से बचाने के लिए उसने अपनी बांहों में रोक लिया और उसके चीखने पर पास में बैठा एक बुढ्ढा लाठी ले कर उसकी तरफ़ दौड़ा और भागने के इस क्रम में वह कांटों में गिरता पड़ता गांव पहुंचा। हंसा की जो तस्वीर रचनाकार ने खींची है, वह भोले भाले ग्रामीण की ही है जिससे बच्चे चिपटते रहते हैं। बच्चों के बिंब यहां भी खूब है । जब हंसा ढोलक लेकर गांव में कांग्रेस की सभा मे सुशीला जी के गायन की मुनादी करता घूमता है तो वहां, ‘दल–के–दल लरिका–बच्चा सब...बोलो, बोलो, गन्हीं बाबा की जय।’ इसी तरह जब हंसा सुशीला का प्यार पा कर कांग्रेस का कार्यकर्ता बन कर गांव में चुनाव प्रचार करता घूमता है तो ‘गांव के बच्चे हंसा दादा के पीछे...’। जब सुशीला की निमोनिया से मौत हो जाती है तो उसके प्यार का संसार सूना हो जाता है, और वह पागल हो जाता है, तब भी बच्चे उसके साथ घूमते हैं। इस तरह इस मासूमियत की कहानी का अंत ट्रैजिक है।
मार्कंडेय जी का चौथा संकलन पहले ‘माई’ शीर्षक से छपा था जिसे उन्होंने बाद मे ‘भूदान’ शीर्षक से प्रकाशित करवाया। राजनीतिक चेतना के दबाव में शायद भूदान के खोखलेपन को उजागर करने के विचार से उन्होंने इस कहानी को केंद्र में लाना उचित समझा होगा। लेंकिन ‘माई’ के केंद्र में वही मासूमियत है जिसे मैं उनकी संवेदनात्मक अभिव्यक्ति की धुरी मानता हूं और जिसकी वजह से वे अलग कि़स्म के रचनाकार दिखते हैं। मासूमियत ‘भूदान’ कहानी में भी छली जाती है जिसमें रामजतन जैसे भोलेभाले किसान को ज़मीदार ठग लेता है, और ज़मीन हड़प कर उसे भूदान के माध्यम से ज़मीन दिलवाने का झुनझुना थमा देता है, और इस तरह वह मासूम ग़रीब किसान ठगा जाता है। लेकिन ‘माई’ तो कहानी ही बच्चों की मासूमियत की है जिनमें से एक मासूम, बीरू, ज्‍यादा संवेदनशील होने की वजह से क्रोधी और तोड़फोड़ करने वाला और साथ ही बीमार रहने वाला बच्चा बन जाता है, मगर माई उसे अपने स्नेह से वंचित करने को तैयार नहीं। यहां माई के लिए सभी बच्चे बराबर हैं, बीरू के प्रति उसका प्यार कम नहीं, जबकि उस उग्रपंथी बच्चे से बाक़ी सभी को शिकायत है। माई जानती है कि जो पढ़ लिख जायेंगे वे तो साहब बन जायेंगे, बीरू का तो उसके अलावा और कोई नहीं होगा। इसलिए माई उसके प्रति अपने मोह में कमी नहीं दिखाती। यहां मासूमियत एक मानवमूल्य के रूप में दिखायी गयी है, माई भी उसी मासूमियत की प्रतीक है।
मार्कंडेय जी का पांचवां सकलन, ‘माही’ है जिसमें उनकी मशहूर कहानी, ‘दूध और दवा’ भी शामिल है । उनकी यह कहानी अपने शिल्प में अलग तरह की कहानी है, इसमें कोई पारंपरिक तरह का प्लाट या चरित्रचित्रण नहीं है, निम्नमध्यवर्ग का वह यथार्थ है जो उस समय की एक सचाई था, आज तो वह नवधनाढ्य वर्ग में तब्दील हो चुका है। उस समय सचमुच ही उसके लिए अपनी बच्ची के इलाज के लिए पैसे जुटा पाना आसान नहीं था। वह अपनी बेबसी का गुस्सा अपनी पत्नी पर उतारता था, क्योंकि उसकी पत्नी और मजदूर की हालत एक जैसी थी। कहानी में बार बार एक वाक्य आता है, ‘मैं समझ नहीं पाता कि स्त्रियां और मजदूर मालिकों को क्यों ओढ़े हुए हैं, महज इतनी सी बात के लिए, या मुन्नी की आंखों के मांड़े की दवा या उसके दूध के लिए’। यदि गहराई में उतर कर देखें तो यहां भी कहानी के वाचक की यह दशा उसकी अपनी मासूमियत ही है, उसके पास वह छल या तिकड़म नहीं है जो उसे एक सफल इंसान बनाने में मदद करती है, वह लेखन से क्या कमाई कर लेगा, वह अपनी बेटी की मासूमियत को भी जिंदा रखना चाहता है, उसका सपना है उसे पेंटर बनाने का, ‘मेरी बेटी, मैं चाहता हूं, वह पेंटर बने...’ उन दिनों पेंटिंग का भी आज की तरह बाज़ार नहीं था, कम से कम धनी बनने का साधन तो कला थी ही नहीं। बच्ची की चिंता और उसकी मासूमियत को दर्शाने वाले कथन कहानी में जगह जगह उभारे गये हैं, उसी तरह के बिंब कहानी में पिरोये गये हैं, इसमें कहानीपन कम और कवितापन ज्यादा देखा जा सकता है, निर्मल वर्मा की तरह का ‘नयी कहानी’ का शिल्प अपने अलग अंदाज़ में अपनी अलग विचारधारात्मक झलक देता हुआ इस कहानी में मार्कंडेय जी ने अपनाया जो नये शिल्प पर उनकी पकड़ को भी रेखांकित करता है। इस संकलन की शीर्षक कहानी, ‘माही’, भी अलग कि़स्म की छोटी सी कहानी है, इसमें दो सहेलियां अपनी अपनी मासूमियत जी रही हैं और एक तरह का अंदरूनी अकेलापन झेल रही हैं। एक रुक्मी जो ब्याहता है और अपने मायके आयी हुई है, यहीं उसकी सहेली माही है जिसके जीवन की एक झलक उस पत्र से मिलती है जिसे रुक्मी पोस्टमैन से लपक लेती है और उसे खोल कर पढ़ लेती है। इन युवतियों की मासूमियत के लिए इस कहानी में भी ‘बच्चे’ के बिंब पिरोये गये हैं। रुक्मी के मायके आने पर ‘बच्चे उसके आंचल से चिपके रहते हैं...’ कहानी की की शुरू की ही पंक्तियों में रुक्मी अपनी सहेली माही को सलाह देती है कि वह अपने अकेलेपन को काटने के लिए बच्चों के साथ कोई खेल ही खेल लिया करे। ‘घर में बच्चे हैं।’ कहानी का बड़ा भाग किसी प्रीतीश को माही के लिए लिखा गया पत्र है जिसमें प्यार से कहीं ज्यादा अलगाव रेखांकित किया गया है, दो अलग अलग वजूद हैं, जिनमें सामंजस्य की संभावना नहीं है। कहानी छिपे तौर पर यह रेखांकित करती है कि माही की मासूमियत प्रीतीश द्वारा छली जा रही है, दूर होने का बहाना तलाश किया जा रहा है, इस छलना को रुक्मी भी पत्र पढ़ने के बाद अपने जीवन में महसूस करने लगती है। इसी संकलन में एक कहानी ‘सूर्या’ है जिसमें सूर्या की मासूमियत का विश्लेषण है, सूर्या का लगाव जगजीत से है जिसे उसकी मां ने कभी नौकर के रूप में रखा था, और बाद में सुनील से उसका प्यार हुआ क्यों कि वह ‘बच्चा’ चाहती थी। मगर जिंदगी के एक मोड़ पर उसे फिर से जगजीत ही मिल जाता है जब वह एक स्कूल में ‘गुरु जी’ बन कर पहुंचती हैं। सतही तौर पर देखने में यह कहानी एक फि़ल्मी अंदाज़ की अविश्वसनीय कहानी लगती है, लेकिन इसे उसी नज़रिये से देखें तो इसके केंद्र में भी सूर्या और जगजीत की मासूमियत ही है, इसे मासूमियत की कहानी के रूप में ही व्याख्यायित कर सकते हैं। महरी सूर्या को जब उनसे पहले वाली मास्टरनी के बारे में बताती है तो इसी थीम का संकेत देती है: ‘आपके पहले वाली गुरु जी तो इसी क्वार्टर में आठ बरस रह गयीं...यहीं ब्याह किया और यहीं उनके बच्चे भी हुए। उन्हीं ने तो जगजीत को रखा था । घर द्वार का कुछ पता नहीं बेचारे का, बचपन से मारा मारा फिरता था। कुछ दिन शहर में किसी के यहां काम कर चुका था...’ महरी को यह पता नहीं कि यह जगजीत सूर्या के ही घर पर काम कर चुका था जब वह सत्तरह–अठारह बरस की थी और उससे वह गर्भवती भी हुई थी। कहानीकार ने कहानी के ‘टैक्स्ट’ में एक जगह सूर्या के लिए ‘भोली बच्चा सूर्या’ पद का इस्तेमाल किया है। इस मासूम को अब सुनील से शादी करने का सपना भयाक्रांत करता हे, उसकी स्वतंत्रता खंडित हो जायेगी और फिर से उसके मन में जगजीत नौकर के लिए एक चाहत पैदा हो जाती है। यह मासूमियत के प्रति मासूमियत का आकर्षण है।
‘माही’ के बाद उनका अगला संकलन,‘सहज और शुभ’ नाम से आया। इसकी शीर्षक कहानी ‘सहज और शुभ’ में वाचक अपने बचपन और अपनी चचेरी बहिन सविता के बचपन के दौरान की मासूमियत को अपनी स्मृति में जीता है। वाचक और सविता एक चिडि़या पकड़ते हैं और उसी के बहाने अपनी मासूमियत की अंतर्कथा पेश करते हैं। एक ओर रमोला दादी हैं जो पिंजड़ों में पक्षियों को कैद किये हुए हैं, दूसरी ओर वह ‘मासूम’ चिडि़या है जो मासूम सविता के कंधे पर बैठती है और उसकी हो जाती है। रिबन से बंध जाने पर भी वह नीबू की एक टहनी से दूसरी टहनी पर फुदकती रही है। यहां पिंजरा नहीं है, नीबू की टहनी पर ही तो है, अपने जैसे मासूम बच्चों के साथ। वाचक इस चिडि़या के लिए ‘मासूम जान’ शब्द का इस्तेमाल करता है।
मार्कंडेय जी का सातवां संकलन था, ‘बीच के लोग’ । वैसे तो बीच के लोग से मध्यवर्ग का अर्थ लिया जाता है। शील जी की एक मशहूर कविता भी इसी शीर्षक से थी जिसे वे ज़रूर सुनाया करते थे, ‘बीच में लटके बीच के लोग’। मार्कंडेय जी की पूरी कहानी मध्यवर्गीय पात्रों की कहानी नहीं है। वह गांव के वर्गीय अंतर्विरोध उभारती है और सिर्फ कहानी के अंत में एक बयान से कहानी के संवेदनात्मक उद्देश्य को उजागर कर देती है कि ‘ज़रूरत तो ऐसी ही है । अच्छा हो दुनिया को जस जस–की–तस बनाये रहने वाले लोग अगर हमारा साथ नहीं दे सकते तो बीच से हट जायें, नहीं तो सबसे पहले उन्हीं को हटाना होगा, क्योंकि जिस बदलाव के लिए हम इस रण को रोपे हुए हैं, वे उसी को रोके रहना चाहते हैं।’ यह बयान एक भूमिहीन किसान, बुझावन के बेटे मनरा के मुंह से दिलवाया गया है जो लाल झंडा पार्टी की किसान सभा का उत्साही युवा कार्यकर्ता है। ऐसा बयान एक क्रांतिकारी युवा के मुंह से कहलवा कर मार्कंडेय ने एक ऐसे यथार्थ को रेखांकित कर दिया जो हमारे देश में अविकसित क्रांतिकारी चेतना का परिचायक है। मनरा की चेतना का स्तर यह है कि मध्यवर्ग क्रांति में आड़े आयेगा तो सर्वहारावर्ग उसे पहले खत्म कर देगा, यह संकीर्णतावादी सोच है, भारतीय क्रांति में मध्यवर्ग की सहभागिता और उसे क्रांति के पक्ष में करने की कठिन प्रक्रिया से बचना या इस तरह का अतिवादी रवैया अख्तियार करना घातक ही हो सकता है, मुक्तिबोध इस कठिन जिम्मेदारी को समझते थे और उन्होंने अपने रचनाकर्म से मध्यवर्ग को सर्वहारा के पक्ष में खड़ा होने के लिए प्रेरित किया, और उन भौतिक परिस्थितियों को भी अपनी रचनाओं में रखा जिनके दवाब में मध्यवर्ग को एक ऐतिहासिक मोड़ पर क्रांतिकारी शक्तियों के साथ आना होगा, अन्यथा समाज का भावी विकास रुक जायेगा। आज पूंजीवाद की विकसनशील क्षमता के बने रहने के दौर में भले ही यह प्रक्रिया मंद या असंभव लगे, मगर मुक्तिबोध के ही शब्दों में, ‘यह भवितव्य अटल है इसको अंधियारे में झोंक न सकते’। ‘बीच के लोग’ कहानी में यह राजनीतिक चेतना का कच्चापन भले ही अंत में झलकता हो, कहानी की बुनावट में उस मासूमियत को बरकरार रखा गया जिसकी चर्चा इस आलेख में हो रही है। गांव में जो उत्पादन के रिश्ते हैं, उनमें एक समरसता बनाये रखने में उस मासूमियत का रोल यहां भी है, जिसे ‘फउदी बाबा की पोती बुचिया’ के बिंब से कहानी के केंद्र में रखा गया है, उस बच्ची के लिए गरीब बुझावन उस खेत में बचे खुचे आलू बीन रहा है जिसके सारे आलू ठाकुर ने चोरी से रात में अपने आदमी लगा कर निकलवा लिये थे और उस चोरी की वजह से गांव में खूनी संघर्ष होने वाला था, मगर गरीब बुझावन जिसका बेटा किसान सभा का कार्यकर्ता है, फउदी दादा की पोती उस बच्ची की मासूमियत और उसके प्रति लगाव के कारण संघर्ष को होने से बचा लेता है। भारतीय गांवों की इस विचित्र संरचना में शोषित और शोषक के बीच के रिश्तों की यह जटिलता है, यहां हर जाति धर्म के लोगों में आपस में पारिवारिक रिश्ते ही बने हुए हैं, यहां धोबिन चाची या ताई हो जाती है, कुम्हार या नाई सभी इसी तरह के रिश्ते से पुकारे जाते हैं। भारत देश में ही यह संभव है कि सब एक जन नेता गांधी को ‘बापू’ के नाम से पुकारने लगते हैं, नेहरू को ‘चाचा’ बना लेते हैं, यह रिश्ते जोड़ने की परंपरा गांवों से ही ली गयी है। इस परंपरा में भी एक मासूमियत ही छिपी हुई है, वरना अपने बापू के अलावा किसी और को बापू बनाना खुद को ही गाली देने जैसा होता।
इसी संकलन में मार्कंडेय जी की एक और मशहूर कहानी है, ‘प्रिया सैनी’। यह कहानी इस संकलन की अंतिम कहानी भी है। नयी कहानी के गैर रोमांटिक तामझाम से बने परिवेश में यह कहानी कई आलोचकों को लिजलिजी भावुकता से भरी हुई कहानी लगती रही। मैंने भी नयी दिल्ली के अपोलो हास्पिटल में उनके दिल के आपरेशन के बाद उनके डाक्टर से मज़ाक में पूछा कि आपरेशन के वक्त कुछ प्रेमिकाओं के फोटो तो दिल में नहीं मिले, यदि मिले हों तो दिखाये जायें, मार्कंडेय जी मुस्कराये। प्रिया सैनी से अलग होने के बाद जो टीस वाचक झेलता है, उसके बारे में कहानी की शुरुआत में ही कहा गया है, ‘मुझे लगता है कि कलेजे की सीयन ही टूट जायेगी...’। और दर्द को बयान करने के लिए कहानी फ्लैशबैक की तकनीक से शुरू होती है। वाचक ‘आज के जीवन में संवेगों की परिवर्तित प्रकृति पर खोज’ कर रहा है और प्रिया सैनी से मुलाकात, उनसे इस बारे में कुछ जानने के लिए करता है। प्रिया सैनी नृत्य की टीचर है और उसके पिता भी ‘आकाशवाणी में ठेके पर कलाकार हैं’। मां नहीं है। पिता के बारे में वह बताती है कि ‘पिता पूर्णत: संत हैं।’ वाचक प्रिया सैनी के लिए भी जिन बिंबों का या उपमाओं का इस्तेमाल करता है उनसे उसकी मासूमियत की ही छवि उभरती है, ‘छोटी सी नदी की तरह स्वच्छ जलधार और मधुर, धीमी ध्वनि का वह संस्कार जिसे सिर्फ प्रिया के चित्र के साथ ही जोड़ा जा सकता है।’ वाचक की दूसरी मुलाकात तब होती है जब उसे प्रिया सैनी की एक नृत्य नाटिका, ‘इंसान की खोज’ देखने के लिए निमंत्रण कार्ड डाक से मिलता है और वहां जाने पर उसका स्वागत प्रिया के प्रेमी या भावी पति के रूप में होता है। नृत्य के बाद जब वह उससे मिलता है तो वहां प्रिया की मासूमियत का बिंब रचनाकार ने पिरो दिया है: ‘प्रिया दोनों हथेलियों को परस्पर बांध कर इस तरह मुस्काराने लगी जैसे कोई नन्हीं सी बच्ची हो।’और उसके बाद उनका मिलन जुलना बढ़ता ही गया जो वास्तविक प्रेम में बदल गया लेकिन इस मासूम प्रिया के जीवन में एक अन्य घटना भी घटी जिसका मर्म जानने के लिए वाचक लगातार प्रिया पर दवाब डालता रहा । उसके पेट में एक शिशु पल रहा था और वह किसका था, इसका उत्तर न मिल पाने की हालत में वह उसे छोड़कर गांव और फिर बंगाल आदि जगहों पर भटकता रहा और जब लौट कर आया तो उसे प्रिया सैनी का एक पत्र मिला जिसमें उस घटना की जानकारी थी जिसमें एक हड़ताली मजदूर उसी तरह उसके कमरे में दाखिल होता है जैसा कि बर्नार्ड शा के नाटक ‘आम्‍स एंड द मैन’ में रायना के कमरे में एक घायल सिपाही और उस सिपाही से रायना का इश्क। प्रिया का भी उस मजदूर से इश्क और फिर रतिक्रिया और उसी के फलस्वरूप उसका गर्भधारण। उस पत्र से सारी जानकारी हासिल तो हो गयी लेकिन प्रिया सैनी हमेशा हमेशा के लिए उससे ‘अलविदा’ कह गयी। यह दंश वाचक को लगातार सालता है।
अंग्रेज़ी के कई कथाकार मासूमियत के प्रतीक पात्रों को ऐसी स्थिति में दिखाते हैं कि उनके लिए यह छल छद्म से भरा संसार जीने लायक नहीं। टामस हार्डी के पात्र इसी तरह चित्रित किये गये थे। ‘टैस’ नाम उपन्यास में टैस के साथ भी यही होता है। वह भी मासूमियत की प्रतीक है। अंत में जब वह उस प्रेमी की हत्या कर देती है जो उसे झूठ और फरेब से अपनी पत्नी बना लेता है तो उसे फांसी की सज़ा सुनायी जाती है और उपन्यास का वाचक व्यंग्य से लिखता है कि ‘लो न्याय होगया । उपन्यास के पहले ही पृष्ठ पर शेक्सपीयर की एक पंक्ति छपी थी जिसका अर्थ था ‘मेरा दिल ही तुम्हारे रहने की जगह है’ यानी छल फरेब झूठ, अन्याय और मारधाड़ से लबालब इस संसार में मासूमियत के लिए कोई जगह नहीं, जो मासूम होंगे वे मारे जायेंगे।
मेरे विचार से मार्कंडेय जी ने अपनी कहानियों में इसी मासूमियत को अपनी रचनाशीलता का विषय बनाया और उसकी जरूरत को रेखांकित किया, क्योंकि मुक्तिबोध की तरह वे भी जानते थे कि ‘भोले भाव की करुणा क्रांतिकारी सिद्ध होती है।

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

सामसुंग के चारण

कुछ महीने पहले एक छोटी सी प​​त्रिका में ​किसी चौधरी का एक लेख पढा था ​जिसमें सा​हित्‍य अकादमी द्वारा सामसुंग के साथ गठजोड का ​विरोध करने वालों की ​निंदा करते हुए लेखक ने सामसुंग का पक्ष ​लिया था, उस लेख पर मैंने जो अपनी ​टिप्‍पणी ​लिखी थी उसे मैं अपने ब्‍लाग पाठकों के ​लिए यहां पेश कर रहा हूं:

सामसुंग के चारण

दक्षिण कोरियाई बहुराष्ट्रीय कंपनी सामसुंग के साहित्य अकादमी के साथ गठबंधन का हिंदी के लेखकों ने जो विरोध किया उसे ले कर कुछ लेखकों के पेट में इतना दर्द हुआ हे कि वह उनकी लेखनी से अभिव्यक्त हो रहा है । शंभुनाथ, उमाशंकर चौधरी आदि कई लेखकों ने लेख लिखकर सामसुंग के चारण के रूप में अपनी छवि बनायी है क्योंकि उन्होंने हिंदी के लेखकों और संगठनों द्वारा किये गये प्रतिरोध को ग़लत ठहराते हुए उनकी लानत मलानत की है। ऐसा हमेशा और हर जगह होता आया है कि कुछ लेखक हमेशा शोषकशासकवर्गों की चरणवंदना करते रहे हैं, शाहेवक्त़ की वंदना करना उनके ख़ून में होता है, उन्हें उम्मीद बनी रहती है कि बहुराष्ट्रीय रसगुल्ला किसी न किसी दिन उनके मुंह में भी गिरेगा ही, पुरस्कार अब चारणवृत्ति से भी अर्जित किये जा सकते हैं। विरोध करने वालों से वे कुछ ज्य़ादा ही खफा हैं, वे जानेजाने बहुराष्ट्रीय कंपनी सामसुंग के चरणदास बन कर प्रतिरोध करने वालों को गरिया रहे हैं । सामसुंग के चारण लेखक महोदय यह तो मानते हैं कि 'लोकतंत्र में और उससे भी अधिक आधुनिक साहित्य में प्रतिरोध ज़रूरी है , आधुनिक साहित्य का तो यह पैमाना ही है', फिर भी वे सामसुंग का प्रतिरोध करने वालों को गरियाते हैं, वे लिखते हैं कि 'हिंदी के लेखकों ने इसके विरोध में आसमान सिर पर उठा लिया था' और 'अंतत: इन बेचारों की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बन कर रह जाती है।' वे इसलिए भी खुश हैं कि इन बेचारे लेखकों की कुछ भी नहीं चली और पूरी शानोशौकत के साथ एक दक्षिण कोरियाई महारानी (प्रथम महिला) के हाथों पुरस्कार वितरण हो गया और सरकार या अकादमी ने इन बेचारों की ओर कोई गौर नहीं किया । इन चारण महोदय ने सिर्फ़ अपनी खुशी का इज़हार ही किया, सामसुंग की वकालत करते समय कोई उसके पक्ष में तर्क पेश नहीं किया । संस्कृति की बहुलतावादी व्याख्या पर एक लेक्चर पाठकों को पिला दिया जिसका मुख्य मुद्दे से कोई ताल्लुक नहीं । क्या सामसुंग के साथ एक अकादमी के समझौते से कोरियाई संस्कृति का भारतीय संस्कृति में मिश्रण हो गया, क्या किसी भी विदेशी समाज की सांस्कृतिक धरोहर वहां की बहुराष्ट्रीय कंपनी के पास रखी है जो किसी दूसरे देश में जाकर वहां की संस्कृति में घोल दी जा सकती है? क्या इसी तरह संस्कृतियों का मिश्रण हुआ है? हमारे हिंदी चारणों का यह बौद्धिक दिवालियापन नहीं तो और क्या है कि सामसुंग साहित्य अकादमी के साथ मिल कर टैगोर पुरस्कार बांटेगा तो दो देशों की संस्कृतियां एक दूसरे में घुल मिल जायेंगी।'
सामसुंग के पैरोकार सबसे पहले उसके उद्देश्य को पूरा करने में जुट गये, यह उन्हें खुद भी नहीं मालूम । बहुराष्ट्रीय कंपनियां जहां भी धन लगा रही हैं, वहां उनका सबसे बड़ा लक्ष्य है साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रतिरोध की ताकत को निरस्त करना और अवाम के जनवादी अधिकारों का साम दाम दंड भेद की नीति से दमन करना । हिंदी के हमारे ऐसे चौधरियों को शायद याद नहीं कि गुडग़ांव में इसी तरह की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने संगठित मज़दूरों की मामूली सी मांग पर चलने वाले आंदोलन को कुचलने के लिए किस तरह की वहशी दमनकारी कार्रवाई की थी, उसका वीडियो टेप अभी तक टी वी चैनलों पर सुरक्षित होगा। क्या इन तमाम बहुराष्ट्रीय निगमों में काम करने वालों को ट्रेड यूनियन अधिकार हैं जो कि हमारा संवैधानिक अधिकार है और जिसे ये निगम अपने पैसे के बल पर जूते की नोंक पर रखते हैं। ऐसे इन निगमों का विरोध हिंदी लेखक करते हैं तो यह उनकी साम्राज्यवादविरोधी चेतना का परिचायक है और इस चेतना की एक लंबी परंपरा है जिस पर हमें गर्व होना चाहिए।
1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के बाद महारानी विक्टोरिया की लुभावनी घोषणाओं के असर में भी हिंदी के बहुत से लेखक उस प्रतिरोध के प्रति इसी तरह की हिकारत की नज़र रखते थे और उसे उन्होंने अपने लेखन में उद्घाटित भी किया, अंग्रेज़ राज सुख साज बताया, उसके प्रति चारणवृत्ति दिखायी, आज के लेखकों के एक छोटे हिस्से में आज भी वह कलंकमयी परंपरा जीवित है, यह अफ़सोसनाक तो है ही, ख़तरानाक भी है। बहुराष्ट्रीय निगमों की यह साम्राज्यवादी कोशिश है कि बुद्धिजीवी हिस्सों में उन्हें और उनकी इस देश में उपस्थिति को स्वीकार्यता हासिल हो जाये । उनका आलोचनात्मक विवेक नष्ट या कुंद कर दिया जाये और वे भूल जायें कि साम्राज्यवाद जैसी भी कोई चीज़ भारत की छाती पर बैठी है। ज़ाहिर है कि इसके लिए उनके पास धनबल के अलावा और क्या है, मज़दूरों को तो दमनतंत्र से वश में किया जा सकता है, आलोचनात्मक विवेक से लैस लेखकों को तो पैसे के लोभ से ही चारण बनाया जा सकता है।
आखिऱ हुआ भी वही । सामसुंग का निशाना सही जगह बैठा और शंभुनाथ समेत कई चौधरी उसके शिकार हो गये । इस समय सामसुंग या किसी भी बहुराष्ट्रीय निगम के गैरसंवैधानिक क़दमों की आलोचना को हिकारत की नजऱ से देखना उसी तरह की चेतना का द्योतक है जिस तरह की पिछड़ी चेतना ब्रिटिश साम्राज्यवाद के चारण कुछ हिंदी लेखकों या बांग्ला लेखकों या अन्य भारतीय लेखकों ने 19वीं और 20वीं सदी के गुलामी के दौर में दिखायी थी। जो लेखक अपनी मासूमियत में सामसुंग समझौते या उसके पैसे से दिये गये पुरस्कारों को स्वीकार्यता प्रदान कराने की ताबड़तोड़ कोशिश में लगे हैं, वे यह नहीं जानते कि आज के हालात में भी साम्राज्यवादी ताक़तें, खासतौर से वित्तीय पूंजी के माध्यम से, हमारे देश को अपने अधीन बनाने की कोशिश में लगी हैं जिससे कि वे यहां के कच्चे माल, सस्ते श्रम और व्यापक बाज़ार पर अपना कब्ज़ा बनाये रख सकें और भारतीय अवाम का शोषण करके अपने अपने देशों की चमक दमक बरकरार रख सकें। हिंदी-उर्दू के बहुसंख्यक लेखक आज भी साम्राज्यवादविरोधी चेतना से लैस हैं और इसी लिए उनकी संवेदनशीलता इस तरह के प्रतिरोधों में झलकती है जिसे समझने में बहुत से चारणचेतना में आबद्ध लेखक असमर्थ हैं और उन्हें यह प्रतिरोध नक्कारखाने में तूती की आवाज़ लगता है। उनकी चारणवृत्ति उन्हें मुबारक !

सोमवार, 1 फरवरी 2010

गांधी जी की पुस्तिका, हिंद स्वराज


30-31 जनवरी 2010 को धनबाद में गांधी जी पुस्तिका, हिंद स्वराज की शती पर पी के राय मेमोरियल कालेज ने एक राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया जिसमें मुझे भी आमंत्रित किया गया। मैंने वहां जो आलेख पेश किया उसे जहां तहां थोड़ा संशोधित करके यहां पेश कर रहा हूं:

गांधी जी की हिंद स्वराज: वैयक्तिक परिप्रेक्ष्य
चंचल चौहान
गांधी जी की बीस अध्यायी छोटी सी पुस्तिका, हिंद स्वराज पर अपने आलेख को प्रस्तुत करते हुए एक स्पष्टीकरण देना जरूरी है । गांधी जी के प्रति मेरे मन में उतनी ही श्रद्धा है जितनी आप सब लोगों के मन में है क्योंकि वे देश के करोड़ों लोगों के जननेता थे और आजादी के संघर्ष का नेतृत्व करने वाले राजनीतिक संगठन के अहम हिस्सा थे। मगर इस पुस्तिका के लेखक मोहनदास करमचंद गांधी को मैं चालीस बरस के एक ऐसे भारतीय नौजवान की तरह देखता हूं जो लंदन में मिले बहुत से ऐसे भारतीय नौजवानों की बातें सुनकर उत्तेजित था क्योंकि वे भारत की आज़ादी के लिए अंग्रेज शासकों को हिंसा के बल पर देश से खदेड़ देने का फलसफा प्रचारित कर रहे थे। वहां से लौटते वक्त जहाजयात्रा के दौरान दस दिनों में लिखी यह किताब मेरे लिए एक “पाठ” है और मेरा ध्यान केवल और केवल इसी के पर्सपेक्टिव को वर्गीय नज़रिये से व्याख्यायित करने पर है, गांधी जी के संपूर्ण व्यक्तित्व का या उनकी विचारधारा का विश्लेषण इसे न समझा जाये, ऐसा मेरा अनुरोध है।

बीस अध्यायों में लिखी इस पुस्तिका पर अनेक भाषाओं में उसके प्रकाशन काल से लेकर अब तक इन सौ बरसों में इतना लिखा गया है जिसे अगर एक जगह रखा जाये तो, मेरा अनुमान है, शायद एक लाइब्रेरी भी कम पड़े। यह पुस्तिका इतनी विचारोत्तेजक है कि तोल्सतोय, मिडिलटन मरे से लेकर गोपालकष्ण गोखले और नेहरू तक इसके प्रकाशन काल में और अनगिनत लेखक और बुद्धिजीवी आज के दिन भी इस पर बहस रहे हैं। ऐसे में मेरे विचार भी किसी ने ज़रूर कह दिये होंगे, ऐसा भी हो सकता है, मैं इन्हें मौलिक समझ कर लिख रहा हूं।
दुनिया में सभ्यता के विकास से ही समाज की बेहतरी के लिए दो तरह के नज़रिये पेश किये जाते रहे हैं, एक नज़रिया तो वैयक्तिक या माइक्रोकास्मिक रहा है जिसके मुताबिक़ सुधार व्यक्ति से शुरू हो और समूह तक हो जायेगा, इस तरह समाज बदल जायेगा, दूसरा नज़रिया सामाजिक रहा है जो मैक्रोकास्मिक कहा जा सकता है जिसके मुताबिक़ परिवर्तन सामूहिक होता है और फिर इकाइयों तक फैलता है। प्लेटो अपने रिपब्लिक की रचना में व्यक्ति पर नज़र टिकाता है, व्यक्तिगत नैतिकता पर ज़ोर देता है और भाववादी दर्शन की नींव रखता है जिसमें आइडिया सत्य है, भौतिक जगत मिथ्या है। गांधी जी ने प्लेटो को पढ़ा था, और उनके भाववादी दर्शन का बीजवपन वहीं से हुआ जिसे हमारे यहां के बहुप्रचलित भाववादी दर्शन से खादपानी मिला जिसमें “ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या” की गुहार थी, और तुलसीदास आदि सगुणमार्गी संतों ने उसे जगह जगह घूमघूम कर प्रचारित किया था, “उमा कहहुं मैं अनुभव अपना/सत हरिभजन जगत सब सपना” या “गो गोचर जहं लगि मन जाई/सो सब माया जानेहु भाई” या “यह संसार फूल सेमल को” आदि आदि। आज भी तमाम साधू संत इसी भाववादी दर्शन का राग जगह जगह अलापते नज़र आते हैं, अनेक चैनलों पर यही संदेश पिलाया जा रहा है कि यह भौतिक जगत नाशवान है, हर आदमी धर्म के रास्ते पर चले तो संसार सुखी हो जायेगा। हर आदमी का चरित्र ठीक हो जाये तो पूरा समाज सुधर जायेगा। इस तरह के उपदेश, भारत के अतीत की दुहाई, भारतीय संस्कति के भाववादी पक्ष का अतिवादी प्रचार आज भी हम सवेरे से शाम तक देखते सुनते हैं।
गांधी जी को भारत की इस धार्मिक आत्मा की पहचान थी, इसी का इस्तेमाल विवेकानंद ने किया था, इसी के इस्तेमाल से वे भारत की बहुसंख्यक जनता को लामबंद कर सकते थे, इसका उन्हें अहसास था, इसीलिए वे किसान के जीवन को महिमा मंडित कर रहे थे और उसी को आदर्श बता कर वे आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के विनाश का स्वप्न देख रहे थे । भारत के किसान समुदाय में भी भाववादी दर्शन का अच्छा खा़सा असर है, इसलिए उन्हें लामबंद करने में भी वह विचारधारा काम आ सकती थी । सहजानंद सरस्वती ने भी संत बन कर किसानों को लामबंद किया था। भारत में धार्मिकता के विस्तार को समझते हुए गांधी जी ने उसी में से अहिंसा, प्रेम आदि की मानववादी मूल्यव्यवस्था का सार ग्रहण किया था जिससे सांप्रदायिक सदभाव और अवाम की एकता का़यम की जा सकती थी, उन सभी धर्मों में भाववाद यानी भौतिकजगत के प्रति उदासीनता भी समाहित थी, इसलिए गांधी के दर्शन के साथ उसका तालमेल भी बैठता था।
गांधी जी में उपनिवेशवादविरोधी भावना उसी तरह तीव्र थी जिस तरह अनेक राष्ट्रवादियों में थी, मगर वे समझते थे कि हिंसा का रास्ता सही नहीं। लंदन में एक रेस्त्रां में उन्होंने सावरकर का उत्तेजक भाषण सुना था, उसी से उत्तेजित हो कर वहां से लौटते वक्त यह पुस्तिका उन्होंने लिखी, हिंसा के रास्ते की पराजय का इतिहास उन्हें शायद ज्ञात था, 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम सफल नहीं हो पाया था, 1905 में रूस में भी जनवादी क्रांति या उससे बहुत पहले पेरिस कम्यून आदि की नाकायाबी के बारे में शायद उन्हें मालूम हो। लेकिन ये घटनाएं उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं थीं, उनका सरोकार उपनिवेशवादी सभ्यता से था, जिसका उन्मूलन सदियों से चली आ रही अजर अमर भारतीय सभ्यता को अपनाने से ही हो सकता था, ऐसा वे मानते थे । इसीलिए वे कह रहे थे, अगर अंग्रेज़ हमने भगा भी दिये और उनकी सभ्यता यहां बनी रही, तो “हिंदुस्तान” तब भी “इंग्लिश्तान” ही रहेगा, उनका ज़ोर हर व्यक्ति की चेतना बदल देने पर था। वे तो अंग्रेज़ को भी भारत में बने रहने देने के पक्ष में थे, बशर्ते वह भारतीय सभ्यता अपना ले । उनका ज़ोर तो “आत्म” पर था। बस “आत्म” बदल जाये तो फिर सारी समस्याएं दूर ।
गांधी जी के बनने में उस दौर की बहुत सी रचनाओं का भी योगदान था, पश्चिम में भी भौतिकवादी सभ्यता की तीव्र आलोचना हो रही थी, उसी आलोचना का प्रतिफलन बाद में टी एस एलियट के “वेस्टलैंड” में हुआ और आज़ादी के बाद शुरू के दशकों में हमारे यहां के “आधुनिकतावादी” रचनाकारों ने भी वही परिप्रेक्ष्य अपनाया। ये सभी रचनाकार भी व्यक्तिसुधार का फ़लसफा़ ही पेश कर रहे थे। टी एस एलियट ने भी हमारे यहां के बृहदकारण्य उपनिषद के तीन शब्द, “दत्ता, दयाध्वाम्, दमयत्” उधार ले कर पश्चिमी सभ्यता के “वेस्टलैंड” के उपचार का नुस्खा पेश किया। ज्यादातर “आधुनिकतावादी” आधुनिकता के खिलाफ़ थे और डिमोक्रेसी को “वेश्या” समझते थे, अग्रेज़ी कवि डब्ल्यू बी येट्स और एज़रा पाउंड के विचार इस बारे में देखे जा सकते हैं। ये कवि विश्वयुद्ध की विभीषिका देख चुके थे, जिसमें हिंसा से भौतिक विनाश ही नहीं, नैतिकता और मानवमूल्यों का भी संहार हुआ था। उन्हीं कवियों से प्रेरणा ले कर हमारे यहां के आधुनिकतावादी कवि धर्मवीर भारती ने अंधायु्ग, कनुप्रिया, नरेश मेहता ने संशय की एक रात और कुंवरनारायण ने आत्मजयी जैसी रचनाएं लिखी थीं। गांधी जी को भी अपनी शिक्षादीक्षा, संस्कारों और स्वाध्याय से प्राप्त किये नज़रिये से यही लगता था कि हिंसा मानवसभ्यता के खिलाफ़ एक घिनौनी हरकत है और उसे तरजीह नहीं दी जानी चाहिए। उन्हें शायद यह डर भी था कि अगर हिंसा के खिलाफ़ चेतना पैदा न की गयी तो भारत के सांप्रदायिक तत्व भारतवासियों को आपस में ही लड़वा कर एकता पैदा नहीं होने देंगे। देश में एकता लाने के लिए भी इस नीति की ज़रूरत थी। उनका यह डर सही भी निकला। वही सावरकर जो लंदन के एक रेस्त्रां में भारतमुक्ति के लिए अंग्रेज़ों के खिलाफ़ व्यक्तिहिंसा पर पुरजोश तक़रीर कर रहे थे, भारत में सांप्रदायिक फ़ासीवाद के प्रणेता बन कर देश की एकता तोड़ने वाला ज़हर घोलने लगे जिससे भारत का विभाजन हुआ और जो आज भी भारत के राष्ट्रवाद को खोखला कर रहा है और उसकी प्रगति में बाधा डाल रहा है।
इसलिए मेरे विचार में हिंद स्वराज में व्यक्त विचारों में से दो की अहमियत आज भी है वे हमारे काम के हैं : एक तो साम्राज्यवाद का विरोध और दूसरे भारत की एकता को बरकरार रखने वाली विचारधारा धर्मनिरपेक्षता या सर्वधर्मसमभाव को भारत की सामाजिक काया में बनाये रखने का आग्रह । बाक़ी बातें जो कि सदियों से चली आ रही भाववादी दर्शनधारा का ही दुहराव हैं और हर तरफ़ उपदेशकों और कथावाचकों के मुंह से लाउडस्पीकर पर या चैनलों पर सुनायी देती हैं, हमारे काम की नहीं हैं और वे सामाजिक विकास की प्रक्रिया में खुद ही नाकारा साबित हो रही हैं। जिसे वे भौतिकवादी सभ्यता समझते हैं, और जो उनकी नजर में मशीनी उत्पादन का नतीजा है, दर असल पूंजीवादी स्वामित्व के युग की देन है और जिसके शोषणपरक और उपनिवेशवादी पहलू पर ही गांधी जी की नजर है। मार्क्स ने वैज्ञानिक तरीके से उसके दोनों पहलुओं पर नजर डाली, सामाजिक विकास में पूंजीवाद के सकारात्मक कदमों को उन्होंने नकारा नहीं, और उसके उन पहलुओं की गांधीजी से ज्यादा तीखे तरीके से आलोचना की जो शोषणपरक उत्पादनसंबंधों और वर्गविषमता से पैदा हो रहे थे । मार्क्स इसलिए बीमारी की जड़ भाववादी दर्शन के तहत व्यक्तिनैतिकता या “आत्म” में नहीं, भौतिक परिस्थितियों में तलाशते हैं और उस भौतिक आधार को बदलने की सलाह देते हैं जिस पर नैतिकता और सभ्यता की इमारत खड़ी होती है।
सामाजिक विकास के अपने नियम हैं और भारत में भी वे नियम ही काम करते रहे, और कर रहे हैं, इसलिए हमारे यहां भी गांधी जी के विचार का समाज नहीं बना, जैसे रूस में तोल्सतोय के विचार का समाज नहीं बन पाया। सभी समाजों में परिवर्तन हो रहे हैं, गांधी जी भौतिकवाद को दुश्मन मानते थे, और पश्चिम की नकल पर बने लोकतंत्र को नकारते थे, मगर उनके न चाहते हुए भी भारत को उसी तरह का संविधान और उसी तरह का लोकतंत्र कायम करना पड़ा क्योंकि उसी तरह की पूंजीवादी उत्पादनप्रणाली और उसी तरह के उत्पादनसंबंध गांधी जी के जीवन काल में ही कायम हो चुके थे । यहां भी उसी तरह की उपरिसंरचना कायम हो गयी जैसा कि भौतिक आधार बना और यह आधार भी इसलिए बना क्योंकि भारत में इसी आधार के वस्तुगत हालात थे। हमारे पड़ोसी देश चीन में वस्तुगत हालात दूसरी तरह के थे, इसलिए वहां दूसरे तरह का समाज बना।
वर्गीय नजरिये से हालात को देखें तो सचाई समझ में आ सकती है। चीन में देशज पूंजीवाद बहुत कमजोर था इसलिए उसे दलालपूंजीपति की भूमिका निभानी पड़ रही थी, वह साम्राज्यवाद के खिलाफ़ संघर्ष की अगुआई करने की हालत में नहीं था, इसलिए वहां का नेतत्व सर्वहारावर्ग की विचारधारा के तहत कम्युनिस्ट पार्टी को हासिल हो गया और चीन 1949 में एक जनवादी गणराज्य बन गया जो अपने विकास के लिए सभी तरह की उन्नत उत्पादनप्रणालियों का इस्तेमाल आज कर रहा है (जिनमें पूंजीवादी दुनिया की प्रणालियां शामिल हैं) और अपने समाज के विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा है।
हमारे यहां उन्नीसवीं सदी के आखिर में देशज पूंजीवाद का उदय हुआ और जल्दी ही यहां आधुनिक मशीनों के माध्यम से उत्पादन की नयी प्रणाली शुरू हुई, धीरे धीरे हमारे यहां का पूंजीवाद मजबूत हो गया, इसलिए आजादी की लड़ाई की अगुआई उसी वर्ग के हाथ आयी, भले ही नवोदित पूंजीपतिवर्ग समझौतापरस्ती दिखाता था मगर वह चीनी पूंजीपतियों की तरह दलाल पूंजीपति की भूमिका नहीं अपना रहा था। उसने अपने कलकारखाने और उत्पादन आदि के नये साधन अपनाये और स्वतंत्रता की कामना व राष्ट्रवाद आदि की विचारधारा का सूत्रपात किया। हमारे यहां के नक्सलवादी इस हकीकत को नजरअंदाज करते हैं, वे आज भी इस गलत समझ के शिकार हैं कि भारत दलाल पूंजीवाद के अधीन राज्य है जबकि असलियत साफ है कि हमारी समाज व्यवस्था इजारेदारपूंजीवाद और सामंतवाद के गठबंधन के अधीन है जो साम्राज्यवाद से आज भी समझौता करता रहता है। इस वर्गीय वर्चस्व के कारण ही गांधीजी के न चाहते हुए भी हमारे यहां संसद वजूद में आयी जिसे गांधी जी पतिता समझते थे और व्यर्थ मानते थे । रेल ही नहीं, अन्य तमाम संचार साधन विकसित होने लगे जिसे गांधी जी इस पुस्तिका में बहुत बुरा कह रहे थे, वह सारी सरकारी मशीनरी, न्यायप्रणाली, उपचारसाधन और भौतिकवादी तामझाम भी अस्तित्व में आ गया जिसे वे कोस रहे थे। वह अंग्रेजी भी राज कर रही है जिसे वे भारतीय भाषाओं से अपदस्थ करना चाहते थे । उनके किसान जरूर उसी बदहाली में जी रहे हैं जिसमें वे उन्हें शायद खुश दिखते थे और जिनकी गरीबी को वे अपनी इस पुस्तिका में महिमामंडित कर रहे थे और उन्हें साक्षर करने तक की जरूरत नहीं समझते थे, और शायद इसी विचारधारा से प्रभावित हो कर मुंशी प्रेमचंद ने रंगभूमि जैसे उपन्यास की रचना की थी । गांधी जी ने अपनी पुस्तिका में वकीलों पर और डाक्टरों पर गुस्से का इजहार किया, वे वकील और डाक्टर भी खूब फल फूल रहे हैं । वे जो नहीं चाहते थे वह सब हो रहा है।
इससे यह तो स्पष्ट है कि समाज की गति भौतिक आधार से परिचालित होती है और आधार बदले जाने पर ही नैतिकता और मूल्य और सभ्यता में तब्दीली होती है, यह परिवर्तन व्यक्तिइच्छा से परिचालित नहीं होता। इसी तरह व्यक्ति व्यक्ति को मार देने से भी व्यवस्था नहीं बदलती जैसा आज माओ या मार्क्स व लेनिन के नाम पर नक्सलवादी कर रहे हैं जिसे लेनिन ने “बचकाना मर्ज़” कहा था और माओ ने भी अपने यहां के अतिवामपंथी तत्वों की कठोर आलोचना की थी । इसी तरह की व्यक्तिहिंसा धर्म के नाम पर तरह तरह के आतंकवादी भी करते रहते हैं और भोलेभाले लोगों को मौत का शिकार बनाते रहते हैं । सावरकर लंदन के रेस्त्रां में जो रास्ता सुझा रहे थे, वह व्यक्तिहिंसा का था और गांधी जी ठीक ही अपने विवेक के कारण उत्तेजित हो रहे थे । मगर व्यक्ति व्यक्ति को नैतिकता का उपदेश दे कर या भारतीय सभ्यता में रंग देने से भी व्यवस्था नहीं बदलती है जैसा कि गांधी जी हिंद स्वराज में सुझा रहे थे । हिंद स्वराज के आधार पर हमारा समाज नहीं बन पाया तो उसकी कमजोरी उसके व्यक्तिपरक परिप्रेक्ष्य में है। देश में बहुत से समूह अभी इस उम्मीद में जुटे हैं कि वे गांधी जी का हिंद स्वराज कायम कर लेंगे, लेकिन उनकी परिणति एक एन जी ओ बन जाने में और कुछ फंड हासिल कर लेने में या कुछ भौतिक परिसंपतियां जुटा लेने में होती है, जैसे तमाम साधु संतों और शंकराचार्यों का वैराग्य उन सभी आधुनिक भौतिक संसाधनों पर कब्जा कर लेने में परिणत होता है जो भौतिकवाद की देन हैं जिसके खिलाफ सदियों से भारतीय सभ्यता के भाववादी मीमांसक बोलते लिखते रहे हैं ।
तब क्या गांधी जी के ये विचार हमारे किसी काम के नहीं हैं । मेरा मानना है कि हमें अपने आलोचनात्मक विवेक से वही करना चाहिए जिसे कबीर ने एक ज़माने में कहा था कि “सार सार को गहि रहै थोथा देय उड़ाय”। जो विचार एक आधुनिक समाज की रचना में सहायक हों, उन्हें प्रचारित प्रसारित किया जाये जैसे उपनिवेशवादविरोध, सांप्रदायिक सदभाव और भारतीय सभ्यता के बहुत से वैज्ञानिक मानवतावादी पहलू जैसे अहिंसा, प्रेम, बहुलतावाद आदि, और जो अवैज्ञानिक और असंगत है, उसे उड़ा देने में कोई हर्ज नहीं, और आप न भी उड़ायें, थोथा तो सामाजिक विकास की प्रक्रिया में उड़ ही जाता है, बंदरिया कब तक मरे हुए बच्चे को चिपकाये रख सकती है।

मंगलवार, 29 दिसम्बर 2009

त्रिलोचन की कविताई


आधारशिला पत्रिका के संपादक ने मेरा यह लेख प्रकाशित करने के लिए मांगा तो मैंने सोचा कि क्यों न यह लेख मैं अपने ब्लाग पर भी डाल दूं । इसी लिए अब मैं यह लेख यहां दे रहा हूं :


त्रिलोचन की कविताई
‘धरती’ से लेकर ‘उस जनपद का कवि हूं’ तक के काव्य संकलनों की यात्रा में त्रिलोचन की कविताई का विकास तलाशना बहुत दुरूह और श्रमसाध्य काम है । त्रिलोचन की कविता का पहला दौर वह था जब भारत अपनी आज़ादी की जद्दोजहद में लगा था । ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ का नारा जहां मुक्तिकामी ताक़तों को संघर्षवती चेतना से लैस करता है वहीं कलाकारों और रचनाकारों में रूमानियत भी लाता है । विश्वसाहित्य इस बात का प्रमाण है कि मानव इतिहास में जब एक युग से दूसरे युग में प्रवेश करने के मुक्तिसंघर्ष छिड़े हैं साहित्य में मुक्त कल्पना का खेल देखने को मिला है । फ्रांस की क्रांति ने समूचे यूरोप में नयी साहित्यधारा को जन्म दिया और रूमानियत के रूप में कल्पना की मुक्ति व्यक्त हुई । इंग्लैंड में नवआभिजाल्यवादी चौखटे और बंधी बंधायी काव्यशैलियां टूटीं और रोमांटिक साहित्य का प्रादुर्भाव हुआ । ‘समानता, बंधुत्व और स्वतंत्रता’ का नारा साहित्य में भी प्रतिफलित हुआ । अठाहरवीं सदी में फ्रांसीसी क्रांति से पहले की कविता शहर की चारदीवारी में घिरी रही, शहरी विषय ही कविता के लिए उपयुक्त विषय माने गये, एक खास छंद ही उपयुक्त छंद माना गया । मगर फ्रांस की क्रांति के बाद कविता आम जन की बात करने लगी, उसने देहाती जीवन और भूखे नंगे लोगों को भी कविता का विषय बनाया क्योंकि उनकी शक्ति का एहसास समूचे यूरोप को हो गया था । इस एहसास ने कवियों में कल्पना की उड़ान को जगाया । यही वजह है कि रूमानी कविता में आकाशचारी बिंबों की भरमार मिलेगी । बादल, चिडि़या, इंद्रधनुष, चांद, सितारे, हवा, आकाश आदि से रूमानी कविता भरी पड़ी है । आज़ादी के दौर की हमारी कविता में कल्पना की उन्‍मुक्‍त उड़ान ​सिर्फ छायावादी कवियों में ही हो, ऐसा नहीं है । छायावादी कविता के अगले चरण में यानी प्रगतिवादी कविता में भी हमें इस रूमानियत के दर्शन लगातार होते हैं । साम्राज्यवादविरोधी रचनाशीलता जितनी अधिक अपनी धरती से जुड़ी थी, उतनी अधिक अपने आकाश से भी । त्रिलोचन की कविता में भी हमें वह धरती और आकाश देखने को मिलता है जिसकी पहचान और जिसका एहसास भारत के स्वाधीनता आंदोलन ने कराया था ।
आज़ादी के बाद के दौर की कविताओं में हमें एक तब्दीली दिखायी देती है और वह तब्दीली है कथ्य में ठंडापन और शिल्प का अतिरिक्त आग्रह । आज़ादी के बाद कवि का काम सिफ़‍र् कलात्मक शब्दरचना भर रह गया, राजनीतिक स्तर पर उसे नव निर्माण का और योजनाबद्ध विकास का आश्वासन मिला, इसलिए रचनाकार का काम किसी तरह की नुक्ताचीनी का नहीं था, उसका सरोकार भी राजनीति से नहीं था, वह काम तो नेहरू के लिए छोड़ दिया गया था, कलाकार तो ​सिर्फ रूप का पुजारी था और इसलिए उसके लिए काव्य शब्द था जो हिमाविद्ध था या ठंडा लोहा । उसकी वह ऊर्जा और उत्ताप गा़यब था जो स्वाधीनता संग्राम ने उसे दिया था । इसके लिए वह दोषी नहीं था, सामाजिक हालात ही उसे इस ओर प्रेरित कर रहे थे। त्रिलोचन की कविता में भी शब्द और शिल्प का यह आग्रह हमें उनकी छठे दशक की रचनाओं में बराबर मिलता है । मुक्तिबोध ने अपनी उस दौर की एक कविता में ठीक ही कहा था :
कविता तब मोतिया सीप थी
धरती के उस एक अश्रु के लिए
कि जो नभ की कमज़ोरी देख गला था ।
लेकिन नभ तो
आसमान था–––
स्वयं उतर वह
झरनों, नदियों, झीलों के नीले प्रवाह के रूपों में
धरती के उर पर पिघल चला था ।
(1/315–316, मुक्तिबोध रचनावली )
त्रिलोचन के ‘उस जनपद का कवि हूं’ संकलन में उनकी दूसरे दौर की कविताएं हैं जिनमें छठे दशक की हमारी मन:स्थिति और शब्दशिल्प के प्रति अतिरिक्त आग्रह मिलता है । त्रिलोचन के काव्यकर्म में यही वह दौर है जिसमें सानेट का प्राचुर्य है । नये शिल्प की तलाश जो कि ज्यादातर ‘सानेट सानेट के लिए’ की सीमा तक पहुंच गयी है, रचनाकारों के आसपास की सामाजिक चेतना के कारण बदली हुई मनोदशा को ही व्यक्त करती है क्योंकि उसे लगता है कि आज़ादी हासिल कर लेने के बाद ‘बसंत आ गया’ :
प्राणाधिके, बसंत आ गया । गूंज रहा था
प्राणों में जो नव जीवन स्वर इन नयनों में
आज रूप बन कर समा गया ।...
छठे दशक में रूप की तलाश ​सिर्फ अज्ञेय या भारती ही नहीं कर रहे थे, अकेलेपन और सूनेपन का राग आधुनिकताबोध के कवियों की चेतना का ही हिस्सा नहीं था, वह उस मोहप्लवित समाज का स्वर था जो आश्वासनों के सहारे सुनहरे कल का सपना ले रहा था । कवि कलाकार भी अपने आसपास के समाज से कट कर एकाकी होने में ही, असंग होने में और अकेले में साधना में लग जाने में ही अपना अस्तित्व तलाश कर रहा था । त्रिलोचन की संवेदना ने भी यह स्वीकार किया कि ‘जीवन का क्रम अकस्मात् कुछ और हो गया, अब तक जो कुछ पाया उसका मूल्य खो गया ।’ इसीलिए त्रिलोचन के वाचक को ‘पथ सूना’ लगता है :
पीछे मुड़कर देख रहा है, पथ सूना है
जिस पर चलता रहा और चलता जाऊंगा
आगे भी । मुझको उस सीमा को छूना है
जहां असीम मुसकराता है । मैं गाऊंगा
जीवन के एकांत क्षणों में ।...
एक अन्य सानेट का वाचक कहता है कि ‘न जाने कैसा कुछ सूनापन प्राणों में भर आया है ।’ इस तरह एक और सानेट में वाचक बताता है कि ‘सूनापन पाया, अपने आस–पास ’ इस सूनेपन को भरने के लिए कवि प्रकृति की ओर मुड़ता है और प्रकृति से फिर मानव पीड़ाओं की ओर । यह प्रक्रिया क़रीब–क़रीब ऐसी ही बन पड़ी है जैसी हमें अंग्रेज़ी कवि वड्‍र्सवर्थ में दिखायी पड़ती है । हालांकि त्रिलोचन ने अपने सानेटों में शेक्सपीयर का फ़ार्म भी अपनाया है, और वड्‍र्सवर्थ का भी, मगर संवेदना का उतार–चढ़ाव मूलत: वड्‍र्सवर्थ जैसा है । त्रिलोचन भी जब सूनापन झेलते हैं तो वड्‍र्सवर्थ की तरह प्रकृति की और मुड़ते हैं । छठे दशक में लिखे गये उनके सानेटों में हमें यही प्रवृति दिखायी देती है । प्रकृति का हर रंग–रूप त्रिलोचन को मोहता है, वह प्रकृति बसंत की हो, शरद की हो, या वर्षा की, त्रिलोचन के सानेटों में वह खूब रमती है :
फूलों की चांदनी नीम में जो आयी है
खींच रही है सुरभि–डोर से मेरे मन को
बरबस अपनी ओर, भला कैसे इस जन को
कृपापात्र कर दिया सुछवि ने जो छायी है
टहनी टहनी पर...
इस दौर की कविताओं में प्रकृति की ओर पलायन नहीं है, उसका आब्ज़र्वेशन है । इस ममता से प्रकृति को निहारना त्रिलोचन के वाचक को सुख देता है । आज़ादी के बाद जिस तरह के समाज की कल्पना, समता पर आधारित जिस व्यवस्था की कल्पना कविजनों ने की थी वह तो दिखायी दे नहीं रही थी, आश्वासनों का आसव ज़रूर पिलाया गया था जिसके नशे में प्रकृति ही––बंधनहीन प्रकृति ही––सुकून दे सकती थी । इसलिए यह आकस्मिक नहीं है कि कवि या तो ‘शिरीष का फूल’ देखता रहता है या ‘बाढ़ चांदनी की आयी’ देखता है या फिर देखता है कि–––
संध्या ने मेघों के कितने चित्र बनाये––
हाथी, घोड़े, पेड़, आदमी, जंगल, क्या क्या
नहीं रच दिया और कभी रंगों से क्रीड़ा
की, आकृतियां नहीं बनायीं ।
त्रिलोचन के एक अन्य सानेट–संकलन ‘शब्द’ में संवेदना का अगला पड़ाव नज़र आता है । ये सानेट 1962 के प्रारंभिक महीनों का उत्पादन हैं । ज़ाहिर है कि इस दौर तक पहुंचते पहुंचते कवि का अनुभवसंसार और अधिक व्यापक हुआ है । मोहभंग की प्रक्रिया ने त्रिलोचन पर भी असर डाला, युवा कवियों में इस मोहभंग ने निषेधवादी रूप अखितयार किया था, त्रिलोचन ने इसे अपने तरीके़ से बयान किया :
उन लहरों पर हूं जिनके तल में भाषाएं
कितनी बैठ चुकी हैं, कितने सुंदर सपने
बिला चुके हैं पानी बन कर, सत्य कभी का
असत् हो चुका है; अब नयी–नयी आशाएं
दिग्दिगंत रूप संवार रही हैं, भाव अभी का ।
हालांकि इन सानेटों में भी कवि बार–बार प्रकृति की ओर मुड़ता है, उसे वहां अब भी सुकून मिलता है, मगर साथ ही इस व्यवस्था के चरित्र की पहचान भी होती दिखायी देती है और कवि इसकी जगह बेहतर व्यवस्था का सपना भी संजोने लगता है :
यहां बाप दादों को नहीं हमें रहना है ।
हमको अपनी आंखों देख–रेख करनी है
अपनी अपनों की अब तो इतिहास पुराना
संग्रहालयों की शोभा है–– सच कहना है
इस जीवन का, घर की नयी नींव धरनी है,
धारण करना है, नवीन मानव का बाना ।
नवीन मानव का सपना संजोए त्रिलोचन का वाचक कभी आशा में और कभी निराशा में अपनी झीनी–झीनी कविता की चादर बुनता है और ‘शब्द’ को कुछ इस तरह रोपता है जिनमें केदारनाथ अग्रवाल की कविता की तरह फूल नहीं रंग बोलते हैं (शब्द–संग्रह उन्हें ही समर्पित भी है) । त्रिलोचन के इन रंगों में ही कहीं न कहीं आशावाद भी फूटता है :
जीवन के जयगान पराजय में भी दूने
होंगे, मन का खेल आप ही उतर जायगा,
दिवस रहे या रात रहे यात्री को इससे
क्या––सारा आकाश पंख से अपने छूने
विहग अरुद्ध उड़ान भरेंगे, मनुज पायगा
पद पद पर संदेश नया मिलकर जिस तिस से ।

‘ताप के ताए हुए दिन’ की कविताओं में त्रिलोचन का रचना व्यक्तित्व अपनी समग्रता में पेश होता है । इस संग्रह में उनकी छोटी–छोटी कविताएं, सानेट और कुछ लंबी कविताएं भी हैं । छोटी कविताएं ज्यादातर चित्रात्मक हैं, उन्हें अर्थों में बांधना न तो संभव है और न ही उसकी ज़रूरत है । इन चित्रों में कहीं ‘सरसों के फूल’ हैं तो कहीं ‘जलरुद्ध दूब’ है, कहीं ‘केले के पत्ते’ हैं तो कहीं ‘काई’ है और कहीं मानव ‘संबंधों के हवामहल’ भी हैं । केदारनाथ सिंह के शब्दों में ‘त्रिलोचन के शिल्प की एक खास बात यह है कि वे किसी भी वस्तु का प्रतीकवत् प्रयोग नहीं करते । अपनी कविता में, वे अपनी सारी काव्यात्मक जि़म्मेदारी के साथ उसे ‘वस्तु’ ही बने रहने देते हैं ।’ कहने का तात्पर्य यह है कि त्रिलोचन यथार्थ को प्राय: ‘प्रकृतिवादी ढंग’ से और अपने पूरे भोलेपन से पेश करने के अभ्यस्त हैं । जिस तरह निराला ने परवर्ती दौर में यथार्थ के भीतर छिपे व्यंग को वाणी दी थी, उसी परंपरा में त्रिलोचन की कुछ कविताएं भी रखी जा सकती हैं । ‘ताप के ताए हुए दिन’ में शामिल सानेट भी त्रिलोचन के इस सामाजिक व्यंग की झलक दे देते हैं । ‘चुनाव के दिन’ या ‘गधे की याद’ में लिखे गये सानेट इस संदर्भ में देखे जा सकते हैं ।

त्रिलोचन की जो लंबी कविताएं संवेदना संकलन से जोड़ती हैं उनकी ऊर्जा उसने साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ी गयी स्वाधीनता की लड़ाई से पायी थी । निराला की तरह त्रिलोचन ने भी ‘मैं शैली अपनायी’ है और वड्‍र्सवर्थ की तरह आत्मचरितात्मक लंबी कविताएं लिखी हैं जिनमें ‘नगई मेहरा’ विशेष महत्व की कविता है । वड्‍र्सवर्थ ने जिस तरह अपनी ‘माइकेल’ शीर्षक कविता में इंग्लैंड के देहाती जीवन और उसके बदलते परिवेश को चित्रित किया है, उसी तरह त्रिलोचन ने ‘नगई मेहरा’ में भारत के देहात का एक अद्भुत चित्र पेश किया है । गांव की जिंदगी में व्याप्त विषमता, रूढि़यां और पिछाड़पन और उसके सकारत्मक पहलू भी इस कविता में चित्रित हुए हैं। कवि ने अपनी तरफ़ से यथार्थ में न तो कुछ अतिशय जोड़ने की कोेशिश की है और न ही ‘अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है’ की भावुकता का शिकार होकर उसने वहां की जि़ंदगी को आदर्शीकृत ही किया है । नगई मेहरा के चरित्र में जो अंतर्विरोध है (यानी रामचरित मानस से प्रेम और पंच परमेश्वर में आस्था एक ओर, और सास को बिठा लेना दूसरी ओर) वह भारत के देहात के भीतर परंपरा भंजन की दुहरी प्रवृतियों का आधार बना है जिस पर स्थिर होकर वह अपने वक्त को अतिक्रमित कर गया ।

त्रिलोचन की कविता का अपना व्यक्तिव है जो किसी गहरे दर्शन के सूत्र की मदद से यथार्थ को पहचानने और उसमें अर्थ भरने की कोशिश नहीं करता । वह वस्तुवादी चौखटे में चित्र खींचने और, विष्णुचंद्र शर्मा के शब्दों में, ‘शब्दों का स्थापत्य पेश करने में माहिर रचना–व्यक्तित्व’ है । यही वजह है कि त्रिलोचन की कविता में कहीं कोई तनाव नहीं, मन को झकझोर देने वाला कोई झंझावात नहीं । शब्दों को सजा कर और उन्हें तराशकर पेश करने की आदत कई बार उन्हें प्रकृतवादी कलाकार बना देती है । आज कलाकार के लिए यथार्थ को ज्यों को त्यों पेश कर देना काफ़ी नहीं है, उसमें उन अथों‍र् को भरने की कोशिश भी होनी चाहिए जो हमें गहरे तक छूते हैं । मौजूदा जनवादी कवियों को त्रिलोचन की यथार्थ को चित्र में बांधने की कला मदद कर सकती है किंतु ये चित्र तक तब अधूरे रहेंगे जब तक इनमें सामाजिक यथार्थ के अर्थ अनुषंग प्रस्तुत नहीं किये जायेंगे । शायद आज की पीढ़ी इस मामले में काफ़ी सजग है, मगर इतने भर से संतोष कर लेना काफ़ी नहीं है । अपनी परंपरा से सकारात्मक तमाम तत्वों को आत्मसात करके हिंदी कविता को स्वस्थ जनवादी दिशा में ले जाने की जि़म्मेदारी आज की पीढ़ी पर है । इस जि़म्मेदारी को किसी तरह के फ़ामू‍र्लों से नहीं निभाया जा सकता है । इसे पूरा करने के लिए सामूहिक सोच और गहन आत्मसंघर्ष करने की हमें ज़रूरत है । त्रिलोचन शास्त्री इसी अर्थ में हमारे कवियों के कवि उसी तरह रहेगे जैसे मुक्तिबोध और शमशेर ।